Monday, June 4, 2018

राजकिशोर की याद में

कतरनों में राजकिशोर! राजकिशोर के निधन की खबर तेज भागती ट्रेन में अचानक किसी के जंजीर खींचकर उतर जाने जैसा है। तब सहारा समय साप्ताहिक अखबार हुआ करता था, जो बाद में दैनिक “राष्ट्रीय सहारा” हुआ और फिर धीरे-धीरे उसकी दशा भी “आज” की तरह हो गई। बेगूसराय में हिंदुस्तान और दैनिक जागरण का तब साझा वर्चस्व था और प्रभात खबर में हरिवंश के कलम का जादू और मार्केटिंग स्ट्रेटजी बदलने तक इन दो अखबारों का ही बर्चस्व वहां कायम रहा। साप्ताहिक सहारा समय अखबार के प्रकाशन बंद होने के बाद समकालीन लेख, टिप्पणियां और वाद-विवाद जैसी सामग्रियों का अभाव महसूस होना शुरू हुआ। हिंदुस्तान और दैनिक जागरण क्रमश: कांग्रेस पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा से प्रेरित थे, इसलिए उनसे उस व्यापक सामग्री की अपेक्षा नहीं की जा सकती थी, जिसकी तलाश तब थी! पुस्तकालयों का चक्कर काटते हुए जनसत्ता का नाम कई बार कान से टकराया था। 2008 के जाड़े की दोपहर थी। सामने डॉ भगवान प्रसाद सिन्हा चेहरे पर भव्य तेज समेटे इंडियन एक्सप्रेस के किसी लेख का अनुवाद कर रहे थे। डॉ सिन्हा मेरे लिए क्या हैं, यह फिर कभी! उनसे बातचीत के क्रम में मुझे मालूम चला कि वह बेगूसराय के उन चुनिंदा पाठकों में से हैं जिनके यहां जनसत्ता आता है। कुछ दिन उनके विश्वनाथ नगर स्थित आवास पर ही बैठकर मैंने जनसत्ता पढ़ना शुरू किया और फिर उस अखबार में छपने वाले लेखों ने कम समय में ही अपनी आदत दिलवा दी। जिन लेखकों ने सबसे ज्यादा आकर्षित किया था उनमें से राजकिशोर एक थे। उनके अलावा जवाहरलाल कौल, सत्येंद्र रंजन, आनंद प्रधान, तरूण विजय, अपूर्वानंद सहित तमाम पत्रकारों के लेख जनसत्ता में रहते थे, जो एक तरह की संतुष्टि का एहसास दिलाते थे। इस अखबार में विचारधारा का प्रसारण नहीं बल्कि मुठभेड़ होती थी, जो इसे अन्य अखबारों से अलग बनाती थी। मेरे अनुभव में जनसत्ता जितना अपने लेखकों को स्पेस देता था, उतना कोई अखबार नहीं देता था। प्रभाष जोशी यूं ही महान नहीं कहलाए। खैर! कई बार ऐसा हुआ कि कोई लेख इतना तथ्यपरक और तार्किक मिला कि उसे कैंची से काटकर फाईल में संग्रह करने की नौबत आ गई। आज मैं मुंबई में हूं लेकिन वे फाईलें अब भी बेगूसराय में सुरक्षित हैं। उन फाईलों में राजकिशोर तब भी जिंदा थे और अब भी जिंदा हैं। राजकिशोर उन कतरनों में हमेशा जिंदा रहेंगे और मेरी फाईल इसकी गवाही देगी। हिंदी के इस मूर्धन्य पत्रकार को मेरी श्रद्धांजलि!

No comments:

Post a Comment