Tuesday, March 20, 2018

मुंबई दूरदर्शन


                                           एक स्वर्णिम दौर का बीतना                                   

बहुत पहले हेमंत आनंद ने कहा था कि अगर तुम कुछ करने के लिए आगे बढ़ोगे तो तुम्हें कहीं न कहीं से मदद जरूर मिल जायेगी। हेमंत आनंद उस अखबार के मालिक के बेटे थे जहां मैंने दो साल इंटर्नशिप किया था।

दिल्ली से मुंबई आने के बाद जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू हुआ था।

"तुम्हारी हिंदी बहुत अच्छी है", यह उनकी पहली टिप्पणी थी जो उन्होंने दूरदर्शन के वरली दफ्तर के पांचवे मंजिले पर धीरे से दी थी। वह यह बोलते हुए पास से गुजर गये और मैं पक्के तौर पर नहीं कह सकता हूं कि उन्होंने जवाब में मेरा शुक्रिया सुना या नहीं। लिखित परीक्षा मैंने हिंदी में दी थी क्योंकि मैं हिंदी में ज्यादा सहज था।

जब परीक्षा का तीनों चरण समाप्त हो गया और मुझे एक स्टाफ से अनौपचारिक तौर पर पता चला कि मेरा चयन हो गया है तो मेरे पैर कुछ समय के लिए जमीन छोड़ चुके थे।

खैर, उसके बाद हुई शिष्टाचार भेंट में मुझे वह आदमी फिर दिखे। उसके बाद अंतिम रूप से अपना काम संभाल लेने तक मैंने उन्हें और उन्होंने मुझे कई बार देखा लेकिन मैं उनके बारे में अनभिज्ञ बना रहा और यह सिलसिला तबतक चला जबतक कि मैंने उनके केबिन के बाहर बोर्ड पर उनका नाम और पदनाम नहीं देख लिया।

अगर मुंबई में चार साल चार दिन की तरह खुशगवार बीते तो इसका पूरा श्रेय जिस एक आदमी को जाता है वह सुदर्शन सीताराम पंतोडे ही हैं, जो तब समाचार निदेशक थे और अब अपर महानिदेशक के पद पर प्रोन्नति देकर उन्हें दिल्ली में प्रकाशन विभाग में तबादला दिया जा रहा है।

तुम जब चाहो मुझसे बात कर सकते हो

मुंबई काफी तेज गति से भागने वाला शहर है। ऐसा कई बार हुआ कि मुंबई की गति के साथ तालमेल न बिठा पाने के कारण मैं अकेला पर गया। बैचलर जिंदगी हालांकि मैंने दिल्ली में लंबी बिताई थी लेकिन मुंबई की बैचलर जिंदगी के अपने कायदे-कानून थे।

घनघोर चुनौती का सामना हमेशा मैं सोकर करता था। जब चीजें पूरी तरीके से उलझ जाती और मैं उसे सुलझाने की कोशिश करते हुए थक जाता तो मैं सो जाता था। मुंबई दूरदर्शन में मेरे साथ काम करनेवाले सभी कर्मचारियों को यह बात जल्दी ही मालूम हो गई। शुरू में लड़कियों ने सोते हुए मेरे कुछ फोटो खींचे और वीडियो बनाए ताकि मैं सतर्क रहूं लेकिन जल्द ही उन्हें मालूम चल गया कि मैं एक बेपरवाह इंसान हूं।

इस बीच अकेलेपन के कारण मैंने कई बार ऐसी बातें आपस में की जिससे मेरे अंदर दबी हुई चीख लोगों को सुनाई दी और फिर अचानक एक दिन पंतोडे सर ने अपने केबिन में बुला लिया।

करीब पांच मिनट तक हम बैठे रहे।

तुम्हें कोई दिक्कत है?
मुझे घर जाना है।
छुट्टी ले लो, घर चले जाओ।

बहुत संक्षिप्त बात बहुत लंबे समय तक हुई और करीब आधे घंटे हम दोनों उनके केबिन में रहे। मैं वहां से निकला तो इस एहसास के साथ निकला को मुंबई में मैं अकेला नहीं हूं। इस एहसास की बदौलत आने वाले साल आसान हो गए।

लेकिन, कुछ समय के बाद ही वापस परिस्थियों के आगे बेबस सा होता गया और वापस गहरे में चला गया। इस बार उन्होंने वापस मुझे बुलाया और फिर वही सवाल दुहराया।

कुछ बात करके उन्हें लग गया कि मेरा तालमेल सहकर्मियों के साथ नहीं बन रहा है और दोस्ती या करीबी में मेरी जरा भी दिलचस्पी नहीं है। वह कई चीजों को समझ गये और उन्होंने सीधे कहा कि जब भी चाहो मुझे फोन करके मुझसे बात कर लो।






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