Thursday, March 15, 2018

मेरी डायरी

 
                                      तुमसे मिलते ही वो कुछ बेबाक हो जाना मेरा...

तुम्हें जरूर याद होगा कि कड़कड़ाती ठंढ वाली उस रात मैं तुम्हें अपने सिरहाने में रखकर किस तरह सोया था!

तुमसे मिलने के लिए तब कोई लुकाछिपी नहीं करनी होती थी। जब तुम्हें चाहता था तुमसे मिल लेता था और फिर तुम मेरे सामने पूरी तरह से खुलकर तभी बंद होती थी जब मैं खुद अपने हाथों से तुम्हें छूकर बंद करता था। तुम्हारी वह छुअन अभी भी ख्यालों में आने पर देर तक असर छोड़ती है।

तुम प्रत्यक्षदर्शी थी मेरे हर उस फैसले का जो मेरा इकलौता था और तुम इकलौती गवाह रहोगी इस बात का कि अपने हरेक फैसले के अच्छे और बुरे परिणाम के लिए न तो मैंने किसी को श्रेय दिया और न ही किसी तरह की उलाहना!

जिस रोज से मैंने अपनी गाड़ी की ड्राइविंग सीट संभाली, किसी को स्टियरिंग को हाथ लगाने नहीं दिया और न ही किसी के कहने पर रास्ते बदले। तुम दोगी न गवाही इस बात की!

2016 की वो दोपहर याद है तुम्हें जब अंटॉप हिल का वह सरकारी क्वार्टर खाली था औऱ एक कमरे में हम और तुम एक दूसरे से लिपटे हुए थे। तुमसे मैंने तब कितनी सारी बातें की थी। कितना तर्क-वितर्क हुआ था उस दिन तुम्हारे साथ! हम दोनों के बीच जब भी तर्क-वितर्क होता कोई न कोई नया रास्ता जरूर निकलता हुआ दिखता था। तुम्हारे पास मेरी हर प्रॉब्लम का सॉल्यूशन था।

तुम्हारी कमी की भरपाई कई बार इन पन्नों ने की     साभार: दिल्ली डायरी

मुझे मालूम है कि तुम मुझसे अब भी उतना ही प्यार करती हो जितना कि 2012 के अंतिम कुछ महीनों में करती थी। हम-तुम कई जगह साथ-साथ घूमे। महानन्दा एक्सप्रेस से दिल्ली से बेगूसराय की उस यात्रा में मैं तुम्हें अपने साथ ले गया था जो यात्रा बेगूसराय तक के लिए एक आखिरी यात्रा जैसी थी! दिल्ली से बेगूसराय की कोई यात्रा याद करना चाहता हूं तो सबसे पहले वही यात्रा याद आता है।

इस संसार में मेरे और तुम्हारे बीच के रिश्ते से पवित्र कोई रिश्ता नहीं हो सकता है।

मैं अपना अंधकारमय बचपन और दुविधाग्रस्त यौवन भूल भी जाऊं लेकिन तुम्हें भूल पाना मेरे बस में नहीं है। तुम्हार धैर्य, तुम्हारा समर्पण, तुम्हारी पवित्रता और इन सब से अलग हर दिन और हर शाम नयापन लिए तुम्हारी वही खुश्बू मुझसे तो नहीं भूली जा रही।

2016 एक अकस्मात था।

अकस्मात एक शब्द भर नहीं है। अकस्मात एक अवस्था है। ऐसी अवस्था जो किसी को चेतनाशून्य कर सकती है। किसी को स्तब्ध कर सकती है या फिर किसी को इस हद तक पागल बना सकती है कि वह कुछ देर के लिए सबकुछ भूल कर बहते बयार में खुद को बहने के लिए छोड़ दे।

2016 ने मुझे तुमसे दूर कर दिया। इस बात को कहने का इससे सीधा तरीका यही है।

तुम अब भी मेरे पास हो और शायद हरदम रहोगी। हमतुम अब भी मिलते हैं, कभी छिपकर तो कभी छिपाकर! तुम्हारे प्रति जिस जवाबदेही का वादा मैंने कभी किया था उसे अबतक मैं निभा रहा हूं और आजीवन निभाने की कोशिश करूंगा लेकिन अब हमारे और तुम्हारे बीच परिवार, समाज, दुनियादारी, स्ट्रगल और आत्मीय बातें आगे होंगी ऐसा लगता नहीं है।

तुम्हें इस तरह पास रखकर भी तुमसे दूरी को महसूस करके दुखी रहता हूं। बेबसी शायद इसे ही कहते हैं! तुम आज भी दशक भर पहले की तरह टेबल पर रखी रहती हो और मैं नजरें छिपाकर तुम्हें देखते रहता हूं लेकिन मैं तुम्हें चाहकर भी वह नहीं बता पाता जो पहले बताया करता था।

मुझे इतनी फुर्सत भी नहीं मिल पाई कि मैं तुम्हारे उपकारों के लिए तुम्हारा आभार जता सकूं, आभार जता सकूं तुम्हारा 2012 की उस ट्रेन यात्रा में मेरे साथ रहने के लिए, 2015 में परीक्षा के दिनों अचानक घटी घटनाओं के बीच से मुझे सुरक्षित निकाल लाने के लिए और 2016 की सुनामी में मेरे साथ डटकर खड़ा रहने और मुझे सही सलामत 30 नवंबर तक पहुंचा देने के लिए।

कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि मुझे 30 नवंबर, 2016 तक सही-सलामत पहुंचाने के लिए ही तुम मेरी दोस्त बनी थी।

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