Sunday, January 14, 2018

कतरनों का


                                                             रोग             

कितने ही ब्लॉग को ड्राफ्ट में डालने के बाद फिर से हिम्मत जुटा कर कुछ रखने यहां आ जाता हूं।

जो यहां रखता हूं वह अपने लिए ही रखता हूं। शब्द न तो रखे-रखे रिश्तों की तरह कमजोर होते हैं और न ही पड़े पड़े आदमी की तरह बेजान। जैसे छोड़िये वैसे ही आपको मिलेंगे।

कभी कभी अपने पुराने पोस्ट को पढ़ता हूं तो गहरे में चला जाता हूं, फिर धीरे-धीरे करके बाहर आता हूं। अपने अंदर बहुत से योगेश से मिलकर कई बार पिछले पोस्ट को पढ़ते हुए ऐसा लगा है कि जो हो रहा है वह इतना अनिश्चित है कि उसके बारे में सोचना बेकार है।

दूरदर्शन डारमेट्री, घाटकोपर, अंटॉप हिल सेक्टर छह फिर अंटॉप हिल सेक्टर पांच और अब मानसरोबर!

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"पिछले गुरुवार को मैंने अपनी जान लेने की कोशिश की। कोई खास वजह नहीं है। कोई तनाव भी नहीं है। मन ऊब गया है। वही शोर, वही आवाजें...शिकायतें नहीं है। अजीब सा एहसास है मन में, अजीब। जिस रोज नया दिन निकलता है, मैं वही पुराना हूं। दुनिया वही पुरानी है। वैसे ही चली जा रही है। मुझे लगा भाई जो ये जिंदगी की गाड़ी चल रही है, इसकी चेन मैं खींचता हूं और मैं उतर जाता हूं..."

फिल्मकारों को पता है कि इरफान खान से क्या कहलवाना दर्शकों को पसंद आएगा। इरफान खान जब इन पंक्तियों को अपनी फिल्म "रोग" में मनोचिकित्सक से बात करते हुए कह रहे होते हैं तो कई स्ट्रगलर इरफान हो रहे होते हैं।

"रोग" फिल्म का एक दृश्य
इन तमाम बातों के बीच जो बात हमेशा सच साबित हुई है वह है हर रात के बाद सुबह होना चाहे रात कैसी भी हो।

रोग एक ऐसी लव स्टोरी है जिसमें थ्रिलर के साथ-साथ गजब का इमोशन भी है। यह इस तरह की शायद पहली फिल्म है। थ्रिलर के लिए हॉलीवुड की कई फिल्में हैं जिन्हें देखा जा सकता है लेकिन उनमें से किसी में इस तरह का इमोशन कहां है!

इंस्पेक्टर राठौड़ की भूमिका में इरफान खान कमोवेश ऐसे हैं जैसे तलाश में आमिर खान थे। दोनों फिल्मों मे एक चीज कॉमन यह है कि रोग और तलाश दोनों ही फिल्में तह तक जाती है। एक आदमी या मर्द के अंदर चल रही उथल पुथल को बहुत करीब से छूते हुए ये दोनों फिल्में निकलती है।

तीसरा पहर काटता हुआ आदमी क्या क्या करता है यह इरफान करते हुए दिखते हैं। मसलन खुद को समाप्त करने की सोच। खुद को समाप्त करने की सोच और आत्महत्या में बहुत फर्क है। आत्महत्या वैसा शब्द है जो डर, तनाव, बेबसी, हार वगैरह से जुड़ता हुआ दिखता है, जबकि खुद को समाप्त करना एक तरह की संतुष्टि को रेखांकित करता है।

संतुष्टि बड़ी चीज है।

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शैलेष पेठे सह्याद्री में एंकर हैं। कुछ दिनों पहले उनके पिताजी की मृत्यु हो गई। दफ्तर में मालूम हुआ कि उनके पिताजी ने शैलेष पेठे के ड्राइवर को कहा कि शैलेष को बोलो कि ज्यादा परेशान अब मत होने, मुझे अब जाना है। वह तसल्ली में थे। फिर उन्होंने स्वेच्छा से ही खानापीना छोड़ दिया।

एक संतोषप्रद जिंदगी।

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क्या सुबह होगी?
अबतक हुई है तो आगे भी होनी चाहिए!

तीसरा पहर जो काट पाया वही सुबह को देखता है और तीसरा पहर काटना ही स्ट्रगल है।

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