Wednesday, November 8, 2017

सहर


                                          पूर्णियां : फिर वही दिल लाया हूं                     

पटना हवाईअड्डे पर वह पहला आगमन था।
अतीत में हुई दुर्दशा और बेगूसराय से मुंबई तक के सफर का हर पड़ाव दिमाग में बारी बारी से अपनी हाजिरी लगवा रहा था।

पुलिस रेड – यस सर। भैया की धुलाई – प्रजेंट सर। मैट्रिक में बेकार रिजल्ट – यस सर। हॉस्टल एक्सिडेंट – आया हूं सर। बाघी – प्रजेंट सर। आहार उत्सव – यस सर। खगड़िया – प्रजेंट सर। दिल्ली – आया हूं सर। कलकत्ता – प्रजेंट सर। "प्रभात किरण इंग्लिश स्कूल" – यर सर। आईआईएमसी रिजल्ट – यस सर। सिटी न्यूज – यस सर। यूको बैंक - यस सर! कोई पहले। कोई बाद में। इस बीच आईआईएमसी, जर्मन क्लासेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, मुंबई विश्वविद्यालय, इग्नू आदि बीच में खड़े होकर हाजिरी देते जा रहे थे ऐसे ही जैसे कक्षा में कोई अपनी हाजिरी बोलना भूल गया हो और अचानक याद आने पड़ हड़बड़ा कर खड़ा होकर बोले।

हर पड़ाव यह जतलाता जा रहा था कि वह स्मृति से कहीं बाहर नहीं गया है और वहीं किसी कोने में मौजूद है।


कितनी देर लगेगी
मामू बस पहुंच रहे हैं ट्रैफिक बहुत है
आप जहां हो वहीं रूको मैं ओला से वहां तक आ जाता हूं
मामू बस आ गया
ठीक है मैं यहीं हूं पिकअप प्वाइंट में

हवाईअड्डे पर उतरकर जो पहला सरप्राइज मिला वह नई गाड़ी थी। पूर्णियां से लाल स्कॉर्पियो भेजा गया था पटना हवाईअड्डे पर पिक करने के लिए।

करीब आधे घंटे के इंतजार के बाद गाड़ी आई और उसके तुरंत बाद फोन बजा।

"बिहार में स्वागत है लक्की
...
गाड़ी कैसी है
तुम्हारे पास तो बोलेरो था न
हां। ये नई गाड़ी है। तुम्हारे बारात जाने के लिए।
...दीदी..."

कई बार ऐसा लगा कि मेरी शादी की जल्दी दीदी को मुझसे ज्यादा थी। दीदी घर की सबसे बड़ी और मैं घर का सबसे छोटा इसके बावजूद परिवार में आपस में जितने भी रास्ते एक दूसरे तक पहुंचने के थे उन सबमें सबसे छोटा रास्ता मेरे और दीदी के बीच ही था। 

अगले दस मिनट में हवाई अड्डे पर ली गई अपनी फोटो घर के वाट्सएप ग्रुप पर भेजकर एक लंबी सांस ली और फिर गहरे में गोता लगा दिया।

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शाम अपनी गति में ढलती हुई बेहद मादक लग रही थी। मुंबई में सड़क किनारे सालों से इमारतों को देखने के बाद सड़क की दोनों तरफ इस तरह बस्तियां, खेत, पगडंडी, दुकानें वगैरह सुहावने लग रहे थे।

"एसी बंद करके विंडो खोल दो।"

हवा आई तो भूख जगा गई। चंदन ने खगड़िया से थोड़ा आगे बढ़कर गाड़ी रोका।

खाना लगा। एक रोटी खत्म हुई होगी कि बाहर लोगों का जुटान शुरू हो गया। शोर बढ़ता गया। चंदन खाना छोड़कर बाहर गया। लेकिन चंदन के आने से पहले कुछ आवाजें एक साथ अंदर तक पहुंची - पांच सौ और हजार का नोट बंद हो गया है।

खाना खत्म करने के बाद काउंटर पर तमाशा इंतजार करता हुआ मिला। होटल वाले ने पांच सौ का नोट लेने से मना कर दिया। काफी बहसबाजी के बाद वह माना।

गाड़ी में बैठते ही ट्विटर खोला। हर तरफ कोहराम मचा था। रघुनाथ सर के ट्विट पर नजर पड़ी, उन्होंने सीधे नरेन्द्र मोदी को ट्वीट कर अपने बेटे की शादी में नोटबंदी के कारण होने वाली संभावित दिक्कतों के बारे में लिखा था।

ऑफिस में भी हाहाकार की स्थिति थी। सब लाइन-अप में जुटे थे। सोशल मीडिया में वैसी हलचल पहले कभी नहीं दिखी थी उस शाम दिखी।

'सर, क्या हुआ है?
बहुत अच्छा हुआ है, अब से 500 और 1000 रद्दी हो गया।
मतलब जो मेरे पास है वो!
अब वह बैंक में ही जमा करो।'

सिद्धार्थ बोडके भारतीय सूचना सेवा के तेजतर्रार युवा अधिकारी हैं और उनसे बात करके मोटामोटी समझ बनी कि आखिरकार हुआ क्या है!

कब मिजाज अपनी जिंदगी से निकलकर विमुद्रीकरण और सोशल मीडिया की तरफ शिफ्ट हुआ पता भी नहीं चला!

उस शाम लाल स्कॉर्पियो में बैठा पुरानी टी शर्ट पहना वह लड़का दरअसल अपनी सगाई में जाने के लिए नहीं बल्कि एक लड़की से मिलने जा रहा था, जिसे उसे अपनी हाजिरी में दर्ज सभी घटनाओं के बारे में स्पष्ट बताना था।

उसे एकबालिया बयान देना था, जिसके लिए उसने खुद को चार घंटे की फ्लाइट में तैयार किया था।

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