Monday, November 13, 2017

दरम्यान


                                                 तुम्हारा नवां महीना और मैं...!

रात तीन बजे टहलते हुए जब बिस्तर के पास आया तो कोई आकर्षण बिस्तर में बाकी नहीं बचा था। एफएम भी शाम से बजते बजते थक गया था और उसके गानों में उमंग जैसा अब कुछ नहीं था।

ड्राॅल से एक मुट्ठी सिक्का निकाला और बिस्तर पर पसारने के बाद फिर से टहलने लगा। लकी अली का कोई गाना एफएम पर आ रहा था। लकी अली "सुर" के दिनों से ही दिल पर छाये हुए हैं।

जाने क्या ढूंढता है ये मेरा दिल तुझको क्या चाहिये जिंदगी...

कमरा छोटा हो तो चीजों पर नजर रखना आसान होता है। बड़ा हो तो मुश्किलें आती है। जिंदगी की तरह ही है कमरा भी। ज्यादा लोगों को शामिल करने पर तनाव बनता है! तुम्हें मालूम है कि लोगों को कैसे और कबतक इंटरटेन करता हूं।

बेकार गृह-प्रबंधन का नजारा 
"हैलो!
जी।
कहां हो!
ट्रेन में हूं।
नंबर भी डिलीट कर दिये!
अरे नहीं जेमिन भाई बताइए।"

आवाज से पहचानने की कला अभी भी जीवित है। उनका कोई काम था, जो सुनने की फुर्सत एक महीने तक नहीं मिल पाई। खैर, नंबर सेव कर लिया उनका। पिछली बार अनुवाद का कोई काम करवाए थे अब फिर उन्होंने किसी काम से ही फोन किया!

झूठ बोलते हैं वे लोग जो कहते हैं रात तीन बजे का वक्त कुंभकर्ण का वक्त होता है जिसमें आदमी कितना भी कोशिश कर ले नींद को टाल नहीं पाता। मुझे तो नींद नहीं आई अबतक!

जो सिक्के बिस्तर पर बिखेरे हैं वह ट्यूब की लाईट में चमक रहे हैं।

ट्यूब से कुछ नोकझोंक याद आई। तुमने तब मुझे नमूना कहा था जब मैंने कहा था कि मेरे मुंह पर अपना लाल वाला दुपट्टा रख दो और स्विच ऐसे ऑन करना कि मुझे मालूम न चले। तुम कुछ बुदबुदाती हुई तीन कदम चलकर लाईट ऑन कर दी। मैंने पूछा लाईट ऑन की हो क्या। तुमने बोला नहीं।

तुम्हारे लाल दुपट्टे से मुझे लाईट की झलकी दिख तो गई थी लेकिन तुम्हारे मुंह से झूठ सुनना प्यारा लग रहा था। कैसा? वैसा जैसे कोई नन्ही-सी लड़की अपने दोनों हाथ से कुछ पकड़कर उसे पीठ के पीछे छिपाकर मासूमियत से बोले कि कुछ नहीं है।

बल्ब या ट्यूब की लाईट में नींद आनी मैट्रिक के दिनों से ही बंद हो गई थी। एक दौर तो वह भी आया था जब बिजली होने के बावजूद ट्यूब बंद करके और लैंप जलाकर रात की पढ़ाई की थी।

ट्यूब जलने पर ऐसा लगता था कि किसी बड़ी दुनिया में बैठा हूं। आसपास बहुत सारी चीजे हैं। बिस्तर है। डायरी है। रेडियो है। खिड़की है। मच्छरदानी है। दीवाल है वगैरह! लैंप की रोशनी में आसपास की चीजें अंधेरे में गुम हो जाती थी और टेबल पर रखी पत्रिकाओं और सीमित किताबों के अलावा कुछ भी नहीं दिखता था।

खुद को सीमित रखने का यह प्रयास बाद में आदत बनी और फिर इस आदत ने खुद को इतना व्यापक किया कि जीवनभर न किसी से दोस्ती हो सकी न दुश्मनी। कुछ संयोग-कुसंयोग जरूर हुए लेकिन निजता हमेशा बरकरार रही।

किसी से बात करने का अर्थ खर्च होना है।

कल किसी ने फेसबुक पर दिल्ली संग्रहालय की एक फोटो डाली थी जिसमें पांच हजार साल पुरानी एक महिला का कंकाल था, जिसके बांये हाथ में चूड़ियों के निशान थे। चूड़ियां सच में कितनी पुरानी परंपरा है न!

चूड़ियां
जिंस की पिछली जेब में जो सिक्के थे उसे भी बिस्तर पर फैलाने के बाद आखिरीबार वाट्सएप खोला तो तुम्हारा मैसेज था "आप हो! 😡" रात साढे दस बजे जो मैंने तुम्हें "कुत्ते का दुम" लिखा उसका रिप्लाई तुमने देर रात दो बजे किया था। कितनी बार कहा था तुम्हे कि चुरा नहीं 'चिउड़ा' होता है! तुम गूगल सर्च से कहीं से "चूरा" लिखा निकालती और मुझे भेज देती। आखिर में मैंने राजपाल प्रकाशन के हिंदी शब्दकोश में तुम्हें "चिउड़ा" लिखा दिखाया लेकिन उस रात शांत रहने के बाद फिर से तुमने "चिउड़ा" को चूरा लिखना शुरू कर दिया।

बिस्तर पर छितरा कर होना और पूरी रात लंबा-चौड़ा होते रहना 2003 के बाद लगी आदत है। 2003 ही वह संक्रमण साल रहा था जबसे कई आदतें छूटी और कई आदतें लगी थी।

रात बीतती रही और सिक्कों की झनझनाहट होती रही। सवेरे "आय ड्राॅप" के लिए बिस्तर पर हाथ फैलाया तो फिर सिक्के एक दूसरे से सटते हुए खनखनाए। यही खनखनाहट इन सिक्कों की सार्थकता थी, जो उन्होंने प्रमाणित कर दी।

यह कृत्रिम झनझनाहट मेरी एक शरारत थी जो मैंने खुद के साथ की थी खुद को यह एहसास भर दिलाने की तुम यहीं हो, यहीं कहीं मेरे साथ हो। हर करवट में तुम्हारी चूड़ियों की खनक जतलाती है कि तुम और हम पास में एक दूसरे को सुला रहे हैं।

वह सिक्कों की खनखनाहट और कुछ नहीं तुम्हारे चूड़ियों की आवाज है। तुम पास हो। चीजों को अनुभव करने की यह पुरानी कला है। दूर की चीजों को करीब से महसूस करना एक कला है और मैं कला का छात्र हूं।


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