Sunday, November 12, 2017

बेकाबू प्रतिक्रिया


फेमिनिज्म से भरी दुनिया में आपकी सुरक्षा की गारंटी कौन लेता है - मुंबई ट्रैफिक पुलिस!

ज्यादा दिन नहीं बीते जब एक महिला द्वारा सेना के जवान को बीच सड़क पर थप्पड़ जड़ने का मामला प्रकाश में आया था। उस मामले और मलाड में हुई ताजा घटना में बड़ा अंतर यह है कि मुंबई ट्रैफिक पुलिस का यह जवान सेना के उस जवान जैसा विनम्र नहीं निकला।

मलाड में कार में बैठी महिला शायद इस गफलत में रही होंगी कि उसके महिला होने का फायदा उसे मिलेगा और वह सही थीं क्योंकि फायदा उसे मिला भी और वह कांस्टेबल निलंबित हो गया। लेकिन नया वीडियो सामने आया है जिसमें पुलिस के जवान महिला से यह विनती करते हुए दिख रहे हैं कि वह गाड़ी से उतरे।

गुरगांव में सैनिक पर हाथ उठाती महिला
कुछ अखबारों ने इस खबर को फेमिनिज्म का तड़के लगाते हुए लिखा है "दूध पिलाती महिला सहित गाड़ी को उठा लिया कांस्टेबल ने"। आह! कितना निर्मम! कितना निर्दयी! ओह!

पत्रकारिता में पार्टी हो जाने से बड़ा अपराध लोकतंत्र में और भला क्या हो सकता है।

महिला किस तरह महिला होने का फायदा उठाकर विक्टिम प्ले करती है यह Jyoti Tiwari की किताब अनुराग से गुजरकर देख लीजिये। मैं खुद भी इसका भुक्तभोगी रह चुका हूं। मुंबई पुलिस का वह जवान सस्पेंड होते होते यह संदेश दे गया कि फेमिनिज्म के जमाने में आपकी सुरक्षा की गारंटी कौन लेता है।

ज्यादा समय नहीं बीता जब गाड़ी की पिछली सीट पर नवजात को छोड़कर एक दंपति द्वारा माॅल में शापिंग करने का मामला तब प्रकाश मे आया जब किसी पत्रकार की नजर उस कार पर पड़ी और उसने वीडियो बनाकर चैनल पर ऑन एयर कर दिया था। इस खबर का जिक्र सिर्फ उनके लिए जिनका दिल "दूध पिलाती महिला को गाड़ी सहित उठा लिया गया" जैसी खबर से पसीज गया।

                                                                                                                                                                मुंबई पुलिस के हाथों मेरी गाड़ी भी टो हुई है और मेरा कई बार मुंबई ट्रैफिक पुलिस से सामना हुआ है। मुझे उनके मेहनत को सलाम करने का मन करता है।


अब याद कीजिए जब मेजर गोगोई ने सेना की टुकड़ी और जरूरी संसाधनों को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए किस तरह एक पत्थरबाज को जीप के आगे बांध कर अपने काम को सफलतापूर्वक अंजाम दिया था। हालांकि शुरू में काफी हल्ला मचा लेकिन आखिर में सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने खुद मेजर की पीठ थपथपाई।

कई बार ऑन द स्पाट फैसले लेने होते हैं। ये फैसले अपने नहीं व्यापक जनहित को देखते हुए लेने होते हैं। मुंबई ट्रैफिक पुलिस हो या सेना का मेजर, उनके सामने वही विकल्प बचा होता है जो उन्होंने किया। उनके साथ खड़े होइए क्योंकि अगर उनका मनोबल गिरा तो जनहित को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। 


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