Sunday, October 29, 2017

समय से संवाद


                                         

                                               छठ की सहर्ष विदाई


2012 से 2017 के बीच बहुत पानी बह चुका है।

अंतर्विरोधों के बीच बीतते समय में कई पड़ाव आए और चले गये। कुछ थोड़े दिनों तक याद रहे, कुछ थोड़े महीनों तक और कुछ बीते कुछ सालों तक। हालांकि इनसब बीते दिनों की हर बातें कहीं दर्ज होती रहीं।

कुछ जाते हुए भी याद आए और आते हुए भी। करीब दशक पहले ठठेरी गली से पटाखों की वह खरीदारी भी याद आई जो छठ के लिए की गई थी और वह डांट भी याद आई जो छठ के दौरान सफाई को लेकर असावधानी बरतने पर घरवालों से लगी थी। छठ की वह शाम भी याद आई जब बुझे मन से बाघी से लोहियानगर पहुंचा था और एक वह भी छठ था जब घर का एक लड़का अचानक आ गया था।

छठ को लेकर बगीचे में कुदाल से पोखर बनाने से लेकर छत पर पांच इंच की दिवाल से पोखर बनाने तक बहुत चीजें समानान्तर चलती रही। कई विघ्न हुए लेकिन छठ अनवरत चलता रहा। न किसी के घर आने से छठ रुका न किसी के न आने से।

कोई धुन थी, जुनून था, आक्रोश था या फिर सीधे सीधे में एक आग थी जो 2012 बीतने के ठीक एक महीने पहले अंदर लगी थी। इस आग से जो चीख पैदा हुई थी वह न तो दब ही पाई और न ही निकल पाई।

2014 में छठ की कवरेज जुहू तट से   (तस्वीर : विकास सिंह)
दिल्ली में छठ का प्रसाद आसपड़ोस से आता रहा और मुंबई में छठ या तो लॉ की परीक्षा के दौरान बीता या फिर जुहू तट पर छठ की लाइव रिपोर्टिंग करते हुए बीतता रहा।

2012 से 2017 का दौर अराजक सा रहा। न छठ को लेकर कोई पहले जैसा आकर्षण रहा न ही किसी और त्यौहार को लेकर कोई उत्साह ऐसा मन के किसी भी हिस्से में महसूस हुआ। जब 2014 में छठ की रिपोर्टिंग के लिए ऑफिस से कहा गया तब भी मन में कोई खास रोमांच नहीं था। संयोग से उसी दिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस का शपथ ग्रहण समारोह भी वानखेडे स्टेडियम में था। मैं छठ से ज्यादा मुख्यमंत्री के कार्यक्रम को लेकर गंभीर था।

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मुंबई वक्त कहां देती है! चार साल चार शाम की तरह ढल गई और अगले एक-दो महीने में पांचवी सुबह दस्तक देगी। छठ में घर जाना इसबार इसलिए अनिवार्य था क्योंकि यह छठ न केवल घर का आखिरी छठ था बल्कि भाग्य के लिए घर का पहला और आखिरी छठ था।

छुट्टी के लिए पूरी ताकत झोंकने का यह फायदा हुआ कि ऑफिस से छुट्टी मिल गई।

होश संभालने के बाद पहला मौका था जब छठ में मुझसे बहुत कुछ अपेक्षित था। कमाने वाला बेटा बनकर घर पहुंचना कई मजेदार अनुभव देता है।

छठ - 2012
फल और पूजन सामग्री की एक सूचि थमाई गई जिसे बाजार से लाना था। यह इस तरह का पहला अनुभव था। भाग्य की सख्त हिदायत थी कि किसी तरह की कंजूसी खरीदारी में नहीं होनी चाहिए। अनानास, सिंघारा, बद्धी वगैरह लेकर घर पहुंचा और फिर ठेकुआ और पिरकिया बनाने में जुट गया। मन इस बात को सोचकर ही खुश हो जाता रहा कि भाग्य के साथ पहली और आखिरी बार घर का छठ मन रहा है।

करीब चालीस साल छठ करने के बाद आखिरकार 27 अक्टूबर को दूसरी अर्घ्य के बाद मां ने छठ के प्रसाद को पंडित जी को समर्पित कर दिया।

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