Thursday, August 17, 2017

समय से संवाद



                                       गोरखपुर से मुंबई वाया दिल्ली

इंग्लिश विंग्लिश जैसी धमाकेदार फिल्म का निर्देशन करने वाली गौरी शिंदे "अहा जिंदगी" को दिए एक साक्षात्कार में कहती हैं कि वह फिल्में इसलिए बनाती हैं क्योंकि यह उनके दिल को अच्छा लगता है.

सपाट कहने वाली और आम बात करने वाली शिंदे एक पंक्ति में बहुत गहरी बात कह जाती हैं. वह मौजूदा फेमिनिस्ट सी नहीं दिखतीं लेकिन उनके समानांतर मजबूत व्यक्तित्व के रूप में जरूर दिखतीं हैं.

पत्रिका लिखता है कि शिंदे उन चुनिंदा महिला निर्देशकों में से हैं जो अपनी शैली को तवज्जो देती हैं. पत्रिका कई बातें गौरी शिंदे के बारे में लिखता है लेकिन जो बात सबसे महत्वपूर्ण है वह है गौरी का इंट्रोवर्ट होना.

इंग्लिश विंग्लिश गौरी की अपनी कहानी है. गौरी कन्वेंट स्कूल में पढ़ीं हैं और उनकी मां की अंग्रेजी अच्छी नहीं है. अपने परिवार के माहौल के ऊपर ही उन्होंने यह फिल्म बनाई जो समाज के एक बड़े हिस्से को अंदर तक छू गई.

प्यासा के बाद यह शायद दूसरी फिल्म है जिसे मैंने अबतक लैपटॉप से डिलिट नहीं किया है.

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पिछले कुछ दिनों में मनहूस खबरों का सैलाब सा आया है. मुंबई में एक महिला का कंकाल उसके घर से बरामद होना, बिहार के एक आईएएस का घरेलू विवादों से तंग आकर आत्महत्या कर लेना, मशहूर टेक्सटाइल कंपनी रेमंड के मालिका का अपने बेटे द्वारा संपति से बेदखल कर भटकने के लिए छोड़ देना सहित न जाने क्या-क्या खबरें पिछले कुछ महीनों में देखने सुनने को मिली. क्या सच में दुनिया ऐसी हो चली है कि यहां सबकुछ जोखिम में रखकर जीया जाये!

गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में दर्जनों बच्चों की दर्दनाक मौत की खबर वह आखिरी मनहूस खबर थी जिसके बाद कुछ लिखने का मन किया.

भाग्य शादी के बाद कई बार कह चुकी है कि अब तुम ब्लॉग क्यों नहीं लिखते! उसे देने के लिए कोई जवाब नहीं है. उसने यह भी भरोसा दिलाया कि मैं अगर अपनी नितांत व्यक्तिगत चीजें भी कहीं लिखूं तो वह उसका पोस्टमार्टम नहीं करेगी!

लेखन एक ऐसी लत है जो लग जाए तो छूटती नहीं है और आदमी के साथ ही जाती है. लत पर कुछ अंतराल के लिए काबू पाया जा सकता है लेकिन लत छूट जाए ऐसा मुश्किल है!

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संजीव मिश्रा उन सीमित लड़कों में से है, जिससे मुंबई में आने के बाद भी सपर्क बना रहा.

करीब पांच साल पहले वह अचानक कुछ दिनों के लिए दफ्तर से गायब हो गया था. जब वापस आया तो चेहरे का रंग सूख चुका था. खिलखिलाते रहने वाला लड़का सहमा सा दिख रहा था. हमेशा की तरह मैंने मजाक किया तो वह हंस दिया. उसकी बनावटी हंसी आसानी से पहचान में आ गई. दफ्तर से बाहर आकर बात की तो पता चला उसके पिताजी की तबियत अचानक बहुत गंभीर हो गई है और फिलहाल गोरखपुर में किसी अस्पताल के आईसीयू में हैं.


ठीक-ठीक याद नहीं है लेकिन चार या पांच हजार रुपये की मदद मैंने उसे तत्काल देकर सांत्वना दे दिया था कि आगे जरूरत पड़े तो बेहिचक मुझसे कहे.

कुछ महीने बाद मैं मुंबई आ गया और फिर हमारा संपर्क एकाध बार हुआ और हमदोनों अपनी अपनी दुनिया में खो गये. मुंबई नया था मेरे लिए 2014 में. दिल्ली की तरह यह शहर आपको मट्ठी, कढी चावल, आलू पराठा, छोले कुलछे या आलू पराठा ऑफर नहीं करता. यह ऑफर करता है वडापाव और कटिंग!

गोरखपुर में हुई जघन्य वारदात जिसमें दर्जनों बच्चों की कथित तौर पर ऑक्सीजन आपूर्ति रोकने के कारण मौत हो गई, के बाद मन व्याकुल हो उठा क्योंकि यह वारदात ऐसे समय हुई जब मैं अपने होनेवाले बच्चे की डिलीवरी मुंबई के एक सरकारी अस्पताल में प्लान कर रहा था.

गाड़ी नीचे लगाई और वाट्सएप चैक करते हुए सीढियों पर चढ़ने लगा. वही खबर हर तरफ पसरी हुई थी. ट्विटर पर कई लोगों ने कई मार्मिक तस्वीरें पोस्ट की थी, एक शख्स ने बच्चे की लाश लिए उसकी मां की फोटो अपने डीपी में लगाई थी. फेसबुक का मंजर इससे अलग नहीं था. न्यूज फीड गोरखपुर में हुई लोमहर्षक घटना पर केन्द्रित थी.

भाग्य ने हमेशा की तरह मुस्कुराते चेहरे और धैर्य से लबालब अपनी आंखों से नजर मिलाते हुए हेलमेट अपने हाथ में ले लिया और हम दोनों अंदर आ गये. कमरे में आकर भी ऐसा लगा नहीं कि कमरे पर आ चुका हूं. मन गहरे में जा रहा था.
नोएडा डीएलए दफ्तर में संजीव                     फोटो संग्रह


अनायास ही संजीव का ख्याल आया और गोरखपुर की खबर को गहराई से जानने के लिए उसे फोन लगा दिया.
वह दफ्तर से लौट ही रहा था. उसकी थकान उसकी बातों से साफ जाहिर हो रही थी.

बात चली तो दिल्ली के संघर्ष भरे दिन याद आ गये. बात बात में यह भी एहसास हुआ कि उसे मेरी आर्थिक मदद अबतक याद थी. बात खत्म होती इससे पहले संजीव ने यह कहकर चौंका दिया कि वह अपने मां और पापा को अपने साथ ले आया है और अब सबलोग दिल्ली के ही पांडव नगर में रह रहे हैं.

लगा कि इस साल की सबसे सुकूनदायक खबर संजीव ने दी. मन किया उसे गले से लगा लूं. ऐसे समय जब बूढ़े लोगों को बोझ या आउटडेटेड सा समझा जा रहा है ऐसे में संजीव का दिल्ली में एक समाचार पत्र में काम करते हुए औसत मासिक वेतन में भी अपने माता-पिता को दिल्ली में अपने साथ ले आना उत्साह से भर देने वाली खबर थी.

पापा की तबियत गंभीर होने के बाद संजीव की अफरातफरी में शादी हुई थी. संजीव शादी के बाद अकेला दिल्ली आ गया था. फेसबुक पर उसने कभी शादी या अपनी पत्नी के साथ कोई फोटो साझा नहीं की थी. जब संजीव ने यह बताया कि वह अपनी पत्नी और मां-पापा को दिल्ली ले आया है तब एक संतुष्टि हुई. यह एक ऐसा पल बीता जो लगातार आ रही अवसादग्रस्त खबरों के बाद थोड़ी सकारात्मकता लेकर आया.


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