Monday, February 20, 2017

खाली समय


                                           लिखने के लिए लिखना

जब पढ़ना बंद हो तो लिखना भी बंद कर देना चाहिए। बिना पढ़े लिखना अपनेआप में अविश्वास पैदा करता है क्योंकि लिखने वाले के मस्तिष्क में यह बात रहती है कि वह जो लिख रहा है उसका न तो कोई ठोस संदर्भ है और न ही सटीक विश्लेषण।

पढ़ाई किसी आदमी को उस मुहाने तक छोड़ देती है जहां से वह अनुभव के सहारे आगे का सफर तय करता है. जैसे कि कोई आदमी पढ़ाई पूरी करके नौकरी करता है और फिर कभी पढ़ाई की तरफ देखे बिना अपने अनुभव से सीखते हुए एक दिन अंत की ओर बढ़ता है. हालांकि कई नौकरियां ऐसी भी होती है जहां नियमित अध्ययन और नवीनता की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। पत्रकारिता ऐसी ही एक नौकरी है।

आम मान्यता है कि पत्रकारिता संवेदना से जुड़ा हुआ पेशा है. हालांकि व्यापक रूप से इसपर बहस जारी है कि संवेदना से जुड़ी पत्रकारिता करने वाले व्यक्ति को वास्तव में पत्रकार कहा जाए या नहीं! ऐसा इसलिए क्योंकि साहित्यकार और पत्रकार दो अलग-अलग शब्द हैं। अगर कोई पत्रकार संवेदना को साथ लेकर पत्रकारिता कर रहा है तो यकीनन या तो वह फीचर लिखता है या फिर मुख्यधारा की पत्रकारिता करते हुए वह ब्लॉगबाजी भी करता है।

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संवेदना से मेरी आखिरी मुलाकात कब हुई थी यह एकदम सही-सही याद करके बताना मुश्किल है. शायद तब जब उस अंग्रेजी शिक्षक ने मेरे सामने उस छात्रा का शुल्क कम कर दिया था, जो वहां अंग्रेजी पढ़ने आई थी. उस लड़की ने अध्यापक से सीधा कहा था कि वह अगले महीने से नहीं आएगी और वजह पूछने पर उसने दो टूक में कह दिया कि उसके पास अब देने के लिए रुपये नहीं हैं. हालांकि प्रथम दृष्टया मुझे वह मामला संवेदना से जुड़ा दिखा लेकिन फिर बाद में ऐसा लगा कि उस छात्रा के उस स्पष्टता से असहज हो जाने और तत्काल कोई विकल्प न सूझने के कारण उस शिक्षक ने यह "महानता" दिखाई. शक आदमी को ऐसा बना देता है कि वह गहरे में जाने का आदी हो जाता है और फिर एक दिन पत्रकार बन जाता है।

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