Monday, August 29, 2016



                                                काऊंटर बंद!

ब्लॉग खोलकर बैठे दस मिनट हो गये लेकिन तय नहीं हो पाया कि किसपर कहां से लिखना शुरू करना है!

इतने देर में दो कॉल आये. मन किया इन दोनों कॉल पर ही बारी बारी से सबकुछ लिखके दिमाग खाली कर दूं। तीन फ्रैंडशिप रिक्वेस्ट फेसबुक पर आये जिनमें से एक को स्वीकार कर लिया और दो को वैसे ही रहने दिया. जिसे स्वीकार किया वह बेगूसराय का कोई नौजवान है। हमारे फ्रैंडलिस्ट में दो म्युचूअल फ्रैंड हैं, जिनमें से एक अंग्रेजी के वह शिक्षक हैं जहां मैं स्नातक के दौरान पढ़ता था और दूसरा मुहल्ले का ही एक लड़का है, जो मुहल्ले के चौक पर ही दुकान चलाता है।

सोचता हूं जे जे हॉस्पिटल के बारे में लिखूं। फिर लगता है लिखने से क्या होगा! क्या जो तीन आदमी ब्लड देने के लिए ओपीडी के काऊंटर के बाहर कतार में पंद्रह मिनट से इस इंतजार में थे कि काऊंटर वाले सज्जन आएंगे और प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, लिखने से उस प्रक्रिया में कोई तेजी आएगी! खुद पर भी क्षुब्ध हो गया था कुछ देर के लिए। साथ खड़ी सिस्टर को जब कहा कि लहाने सर ही डीन हैं न अभी तो उसके चेहरे का भाव थोड़ा बदला था। शायद उसे लगा होगा कि मैं डीन को फोन न लगा दूं!

डॉ समकित को पहली बार इस तरह बर्ताव करते हुए देखा। कोई बुजुर्ग अपनी पत्नी को व्हील चेयर पर ले जा रहा था। शायद कोई बात हो गई थी जिससे समकित नाराज थे। शुक्रवार को जब उनसे मिला था तो उनका फोन लगातार बज रहा था। जब वह खुश होकर बता रहे थे कि एम डी की पढाई भी पूरी हो गई तभी उनका फोन फिर से बजा तो मुझसे रहा नहीं गया और मैंने विनम्रता से कह दिया कि आप बात कर लीजिए। इस बीच जो चीज मैंने नोटिस की, वह उनके हाथ में समा चुका फोन था, जिसमें कैमरा तक नहीं था. काफी पुराना मॉडल का कोई फोन था.

एम डी करने और जे जे अस्पताल में डॉक्टरी करने के बाद ऐसा फोन! खैर!

डॉ समकित को मोह है गरीब मरीजों को देखने का. कुंआरे हैं. आगे क्या होगा पता नहीं! काफी देर बाद ब्लड लैब के काऊंटर पर एक आदमी आया लेकिन इंतजार कर रहे परिजनों के साथ कोई अनबन होने के कारण उसने यह कह दिया कि खून के नमूने लेने का समय खत्म हो गया है! मराठी में गर्मागर्मी हुई लेकिन बात दोनों के इगो पर आ चुकी थी तो नतीजा सिफर ही रहा. काऊंटर बंद!

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