Saturday, August 20, 2016

कालांतर


                                              हिंदी, अंग्रेजी और मराठी
                                           
हिंदी का इस तरह लौटकर आना दिल को गदगद कर रहा है। घबराहट का ऐसा बेचैन दौर जो पिछले कुछ सालों से चला है, इसके खत्म होने का एहसास ही दिल में रोमांच भर देता है।

अंग्रेज़ी से स्नातक करने के बाद हिंदी पत्रकारिता और फिर डीडी न्यूज में अंग्रेजी रिपोर्टिंग! प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए अंग्रेजी में लेखन कार्य करना और कई बार अंग्रेजी में ही जीना! कोई बार ऐसा लगा पिछले कुछ सालों में कि हिंदी से दूर होता जा रहा हूं! अंग्रेजी को स्तरीय बनाने के लिए जतन करते हुए हिंदी के साथ चलना बड़ी चुनौती बन गई और इस दौरान कुछ मौके ऐसे आए जब लगा कि मैं हिंदी के बजाय अंग्रेजी में खुद को बेहतर तरीके से अभिव्यक्त कर सकता हूं। इस बीच मन में हमेशा भावनात्मक खालीपन के पसर जाने का अंदेशा होता रहा।

बचपन में किसी पत्रिका में एक कहानी पढ़ी थी कि कोई राक्षस था जिसकी जान एक कबूतर में थी. बहुत मशक्कत करके कहानी के नायक ने उस कबूतर का गला मरोड़ा और राक्षस के आतंक से सबको निजात दिलाया. बिहार के हर पत्रकार की जान हिंदी में ही बसती है और यह मानी हुई बात है. रविश कुमार, अजीत अंजुम, मनोरंजन भारती सहित तमाम धुरंधरों नें अपनी हिंदी की बदौलत अंग्रेजी मीडिया की खटिया खड़ी कर रखी है.

दूरदर्शन में आकर हिंदी हाथ से रेत की तरह फिसलती गई. एक समय ऐसा आया जब लगा कि अंग्रेजी को तंदुरुस्त करने के चक्कर "माया मिली न राम" वाला हाल हो गया है और हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषा पर अपनी पकड़ ढीली होती महसूस होने लगी।

दिल्ली में हिंदी वेंटिलेटर पर जा चुकी थी लेकिन मंजीत ठाकुर और विकास सारथी जैसे सहकर्मियों के कारण हिंदी बची रही लेकिन मुंबई आकर हिंदी को बचाने की चुनौती और कठिन हो गई. दिल्ली में बस हिंदी को अंग्रेजी के साथ साधना था लेकिन मुंबई में मराठी भाषा भी शामिल हो गई. तीनों को एक साथ साधने के चक्कर में हिंदी और चिंताजनक स्थिति में पहुंच गई.

16 जुलाई को जब विवादित इस्लामिक प्रचारक जाकिर नाईक की प्रेस वार्ता आयोजित की गई तो उसे घेरने का वह ऐसा मौका था जो आसानी से दूसरी बार नहीं मिलने वाला था. कहते हैं आप चाहे कितनी भी भाषाएं और बोलियां जानते हों लेकिन जब आपको अपनी भड़ास निकालनी हो तो आप अपनी बोली में ही उसे अभिव्यक्त करके संतोष पाते हैं. तय किया कि जाकिर नाईक से अंग्रेजी और मराठी में सवाल न करके सीधे अपनी हिंदी में सवाल ठोकूंगा.

कई निजी समाचार चैनल जाकिर नाईक की प्रेस वार्ता को लाईव कर रहे थे. मैंने अपना सवाल हिंदी में किया. जो हुआ उसका अंदेशा मुझे भी नहीं था. नाईक ने सवाल को बीच में काटते हुए मेरी हिंदी की तारीफ की और गुजारिश की कि मैं थोड़ी आसान हिंदी में बात करूं. पिछले तीन साल में जो पल अद्भुत रहे उनमें यह पल भी जुड़ गया.





जो हुआ उससे मैं बुरी तरह भावविभोर हो चुका था. मन बेचैन हो रहा था. चाह रहा था कि तुरंत डीडी न्यूज छोड़कर किसी हिंदी समाचार चैनल में काम शुरू कर दूं. दूरदर्शन मुंबई में शाम छह बजे मेट्रो न्यूज का एक कार्यक्रम होता था और उसके लिए काम करने के चक्कर में हिंदी से बहुत दूरी बन चुकी थी.

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अभी जाकिर नाईक के प्रेस वार्ता का करीब एक महीना हुआ था कि मुंबई विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में एक संसद आयोजित की गई. यह एक प्रतियोगिता थी जिसमें हिंदी की छूट थी. चार घंटे लगातार बहस चली और आखिर में मुझे विजेता घोषित कर दिया गया. जब मंच से यह कहा जा रहा था कि विजेता को वार्षिक समारोह में मुख्य अतिथि के हाथों सम्मानित किया जाएगा, तब मैं थोड़ी देर के लिए शून्य हो गया था.

हां, मेरी हिंदी लौट आई है. मेरी बोली लौट आई है. हां मैं हिंदीभाषी हूं और मुझे गर्व है इसपर।



                                   



तस्वीर साभार : विशाखा वोरा, अंकित गुप्ता, सुजाता माधवानी



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