Wednesday, July 6, 2016

समय से संवाद



                                                      बकाया

हां अफसोस है! है अफसोस कि बने रास्तों को अपनाकर क्यूं नहीं टाल दी इस त्रासदी को! क्यूं इतना जोखिम मोल लिया कि संकरी गलियों में इस तरह फंस गया जैसे कोई पतंग किसी बड़े पेड़ के झाड़ में फंसती है। झटका दे देकर पतंग को छुड़ाने की कोशिश की जाती है। दोनो तरह के अनुभव हैं- पतंग के छूट जाने का भी और झटके से धागा टूट जाने का और पतंग का बेसहारा होकर वहां फंसे रह जाने का।

इस तरह मिलते मिलते छूट जाने का यह सिलसिला ही चल पड़ा है। शुक्र है कि मैं खुद से नजर मिलाकर यह कह पाता हूं कि अबतक जिन चीजों के कारण हमें सजा दी जा रही है, दी गई या दी जाएगी, उनमें मेरी कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका नहीं है।

एक ख्वाहिश जो पूरी होनी बाकी है वह है सोने की। एक तसल्ली भरी नींद। ऐसी नींद जिसमें कोई कोमा नहीं हो, सीधा पूर्ण विराम हो। एक ठहराव।

             Courtesy : Shyama G. Mishra

सुनो क्या तुम मेरी एक ख्वाहिश पूरी कर दोगी? क्या! नहीं पहले बोलो कर दोगी? पहले बोलो क्या। रहने दो। अच्छा ठीक है बोलो, कर दूंगी। पक्का न! अब बोलोगे या ऐसे ही करते रहोगे! सुनो अपना हाथ मेरे हाथ पर रखो। लो। देखो मुझे सोना है। हां वो तो तुम रोज सोते हो। नहीं, मैं रोज सोता नहीं हूं...कब से नहीं सोया मैंने..मैं बेहोश होता हूँ रोज...किसी शराबी की तरह बिस्तर पर, ट्रेन में, बस में या कहीं पर भी गिर जाता हूं, सोता नहीं मैं कभी। तुम पागल हो गये हो योगेश! प्लीज मुझे कुछ भी बोलो लेकिन योगेश मत बोलो...योगेश कभी सोएगा नहीं..जो तुमसे एक नींद मांग रहा है वह योगेश नहीं है। तो फिर वह कौन है? वह कोई भी है..कुछ भी नाम दे दो उसको लेकिन योगेश मत बोलो। ठीक है तुम्हें मैं नींद दूंगी लेकिन मुझे बदले में क्या दोगे तुम? मेरे पास कुछ नहीं है तुम्हें देने के लिए...फिर भी तुम्हें लगता है कि कुछ है मेरे पास जो मैं तुम्हें दे सकता हूं तो बिना मांगे ले लो। ठीक है तो तुम मुझे इजाजत दो कि जो नींद मैं तुम्हें दूंगी उसमें तुम मुझे अपने सपने में आने दोगे क्योंकि मैं भी चाहती हूं तसल्ली के कुछ पल तुम्हारे साथ बिताने के लिए।

क्या है जो है और क्या है जो नहीं है! क्यूं आए तुम बंबई? क्योंकि मैं जवाब देना चाहता था सबको। तो दे दिये न अब लौट क्यूं नहीं जाते मुख्यधारा में!

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