Thursday, June 30, 2016

एक छुट्टी का न मिल पाना


समय से संवाद

                                   इस तरह अकेला छूटते जाना...


ऑफिस वाला लड़का होने के बाद पहली बार छुट्टी न मिलने से ऐसी मायूसी हुई. एक साथ बहुत कुछ साधना व्यावहारिक रूप से समय समय पर ऐसे अनुभव देता रहता है.

बीते साल से ही फोन पर लगातार याद दिलाया जाता रहा कि 30 जून को तुम्हें हर हाल में घर पर रहना है. टिकट तक भेजने की बात हो चुकी लेकिन आखिरकार हुआ वही जिसका अंदेशा था. मम्मी-पापाजी की शादी की पचासवीं सालगिरह में मैं शामिल नहीं हो पाया.

मीडिया में आने के बाद ऐसा पहली दफा हुआ जब मुझे ऐसा लगा हो कि मैं अब वह लड़का नहीं रहा जो आसानी से कहीं भी कभी भी उपलब्ध हो सकता हूं.

कभी-कभी ऐसा लगता है कि खुद को कहीं गिरवी रख दिया है और जो रकम उसके बदले मिलती है उससे पढ़ाई कर रहा हूं. कब तक पढूंगा और कितनी पढ़ाई करूंगा यह सवाल कुछ लोगों ने किया है लेकिन जवाब मुझे खुद ही नहीं मालूम. सही यही है कि लाख प्रयास के बावजूद अगर आज छुट्टी नहीं मिली तो इसका कारण मेरी पढ़ाई ही रही, जिसके लिए मैंने एक महीने पहले ही करीब पंद्रह दिनों की छुट्टी ली थी.

पढ़ाई क्यूं जरूरी है? क्या पढ़ाई इतनी जरूरी है कि इसके सामने तमाम चीजों को दोयम कर दिया जाये.

पाश की एक कविता है "क्या क्या नहीं है मेरे पास"

क्या-क्या नहीं है मेरे पास
शाम की रिमझिम
नूर में चमकती ज़िन्दगी

लेकिन मैं हूँ
घिरा हुआ अपनों से
क्या झपट लेगा कोई मुझ से
रात में क्या किसी अनजान में
अन्धकार में क़ैद कर देंगे

मसल देंगे क्या
जीवन से जीवन

अपनों में से मुझ को क्या कर देंगे अलहदा
और अपनों में से ही मुझे बाहर छिटका देंगे
छिटकी इस पोटली में क़ैद है आपकी मौत का इन्तज़ाम
अकूत हूँ सब कुछ हैं मेरे पास
जिसे देखकर तुम समझते हो कुछ नहीं उसमें

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