Saturday, June 18, 2016

समय से संवाद


                                                         दरबदर


क्या लिखने से कुछ होगा? क्या इस दौर को अगर हूबहू कागज या ब्लाॅग के उस डब्बे में उतार दिया जाए तो कुछ होगा! उम्मीद और आशा किससे है तसल्ली की!

देर रात डेढ बजे भी घड़ी की सुइयां वैसे ही चलती हैं जैसे सुबह नौ बजे की। नौ बजे से पहले भी शायद वैसे ही चलती होंगी और रात दो बजे के बाद भी वैसे ही। दिवाल घड़ी की बैट्री आखिरी बार बेगूसराय में बदली थी। चप्पल खोलकर टेबल पर चढकर घड़ी उतारना फिर उसमें नई बैट्री डालना जैसे किसी मुर्दे में जान डाली गई।

जीवन का यह सतत प्रवाह घड़ी के जैसा ही है। सुबह से आधी दोपहर, आधी से पूरी दोपहर, पूरी दोपहर से आधी शाम फिर पूरी शाम और फिर रात का क्रमश: पहला, दूसरा और तीसरा पहर और तीसरे पहर के बाद सुबह की धूप।

तुम इन सब के बारे में सोचना बंद क्यूं नहीं कर देते? क्या तुम ये चाहते हो कि मैं जीना छोड़ दूं! ऐसा तो नहीं कहा मैंने, मैंने तो बस इतना कहा कि तुम इन सब बातों के बारे में हमेशा क्यूं सोचते हो...और भी तो बातें हैं सोचने के लिए। जैसे? जैसे कुछ भी...सोचो कि आगे क्या करना है या फिर कुछ अच्छा सोचो। आगे क्या करना है यह सोचने की उम्र बीत चुकी इसलिए उस बारे में नहीं सोचता हूं। तुम हमेशा उम्र को क्यूं बीच में लाते हो,अभी तो सत्ताइस पार किए हो। उम्र की गिनती साबुन की गिनती से अलग है। फिर वही दार्शनिक वाली बात...छोड़ो चलो यहां से...बहुत नेगेटिव वाइब्स है यहां। मैं जहां जाऊंगा वहां ऐसे वाइब्स आ ही जाएंगे। तुम खुद को इतना मनहूस क्यूं समझते हो यार! क्योंकि मैं हूं।

देखो ये जो वक्त है न यह बीत जाएगा। इसके बाद वाला वक्त भी बीतेगा और उसके बाद वाला वक्त भी। रह जाती है बस उस वक्त में बीती चीजें, जिन्हें हम याद कहते हैं।

अच्छा ये बताओ कि तुम्हारी अबतक की सबसे अच्छी याद क्या है...झट से बताओ बिना सोचे...! ... ! तुम सोचने लगे न...बोला था झट से बताने... तुम कोई भी काम बिना सोचे नहीं कर सकते क्या! नहीं। मैंने बोला तो भी नहीं! मेरे बस में ही नहीं है। अच्छा खूब सोचकर बताओ कि तुम्हारी अबतक की सबसे अच्छी याद क्या है? कोई सबसे अच्छी याद नहीं है...हां कुछ अच्छी यादें हैं जैसे पापाजी ने उस दिन फोन पर कहा था कि गांव में वह काम मेरी वजह से आसान हो गया, बरौनी में भी मेरे होने का असर हुआ और इतने सारे मैसेज, मेल वगैरह ये सब अच्छी यादें ही तो हैं। अच्छा ये बताओ सबसे बुरी याद क्या है? उस आदमी का उस रोज मुझे उस जगह मारना। ये तुम हो योगेश...यही तुम हो...जिस दिन तुम जिस तरह बिना सोचे अपने जिंदगी के सबसे बुरे समय को याद कर लेते हो उसी तरह जिस दिन बिना सोचे सबसे अच्छे समय को याद कर लोगे, उस दिन यह दौर बीत जाएगा।

प्रिय तुम,
            अब आ जाओ। बाकी अगले खत में।

तुम्हारा समय!
                              

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