Friday, April 15, 2016

समय से संवाद



                                       सुबह से लेकर शाम तक

सुबह, दोपहार, शाम और रात. दिमाग के अंदर यह अवस्था बिल्कुल नियमानुसार चल रही है. पहले ताजगी, फिर थोड़ी देर में तपता सा कुछ, फिर समयांतराल के बाद ठंढक और फिर घोर नकारात्मकता.

ताजगी. सबकुछ सही है, जो सही नहीं है उसे सही कर लिया जाएगा. विकल्पहीनता का सकारात्मक भाव. उम्मीद. भरोसा. विश्वास. आत्मविश्वास. ऊर्जा. जोश और वो सबकुछ जो ताजगी से भर देता है किसी युवामन को और उसमें ऐसी भावना विकसित करता है कि एक समय के भीतर वह हर चीज से ऊपर उठकर कुछ सोचने या कुछ फैसला लेने की क्षमता रखता है.

फिर दोपहर. कुछ-कुछ तपता हुआ. हर सोच जो शुरू में ठंढ और मीठी सी रजाई में लिपटी आती है वह धूप की चपेट में आकर रूखी होनी शुरू हो जाती है. जो दिमाग यह सोचकर ठंढा रहता है कि सब सही है और गेहूं के खेत की तरह हवा में यहां से दूर तक एक तरफ झुक जाता है, उस खेत का हर छोटा-बड़ा पौधा तनने लगता है. हर छोटी चीज धूप में कड़ी हो जाती है. हर शब्द रूखा सा लगने लगता है और जो ठंढक सुबह मिलती है वह तप जाती है. यह दोपहर की बेला अजीब सी तनाव भरी होती है.

दोपहर देर तक चलता है और फिर धीरे-धीरे शाम की तरफ बढ़ता है. शाम थकी सी होती है. हर बात को मानने के लिए करीब-करीब तैयार रहती है. चीजों के आवेग को आंके बिना आगे होती जाती है. बहुत सुहानी होती है और बहुत मुलायम. चीजों को मानने या न मानने में ज्यादा जिद नहीं करती. मानी हुई चीज के खिलाफ कुछ तर्क पेश होने पर उसे नकारती है लेकिन फिर उसे स्वीकारती हुई सी भी दिखती है. बहुत ही उलझन भरी होती है यह शाम. इसी उलझन को मनहूसियत भी कहा जाता है.

रात नाउम्मीदी से भरी होती है. सबकुछ अप्रत्याशित होता है. एक बंद अंधेरे कमरे में अचानक किसी बरतन का ऊपर से गिरना और देर तक उसकी गूंज बंद कमरे में कंपन पैदा करते रहना. ऐसी ही रात होती है. रात धीरे-धीरे तीसरे पहर की ओर जाती है और आत्मविश्वास को बड़ी ही बारीकी से मार देती है. रात तीसरे पहर तक चलती है और फिर सुबह आती है.

यह चक्र चलता रहता है.

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