Tuesday, March 8, 2016

समय से संवाद



                                               देर-सबेर
                                   

                                      अब हर इक बात पर मैं राजी हूं
                                      जाने ये कौन मर गया मुझमें
                                                                               - सुहैल अख्तर

तुम्हें लिखना चाहता हूं. चाहता हूं कि तुम्हें प्रमाणित कर दूं लिखकर. मन करता है लिखूं कि कैसे कतरा कतरा करके आखिरी बूंद तक निकाल देना चाहते हो तुम मेरे जिस्म से, ताकि मैं न रहूं. इतनी निर्दयता और क्रूरता के साथ खेला गया यह खेल चाहे जिस नतीजे पर पहुंचे लेकिन तय है कि मैं जीत कर भी उसकी खुशी में शामिल नहीं हो पाऊंगा.

स्थिरता और ठहराव! ठहराव बिन जीवन अत्यधिक व्यापक होता जाता है और समयांतर के बाद एक ऐसी स्थिति में पहुंच जाता है जहां से उसे समेट पाना बहुत मुश्किल दीखता है. यह वैसा ही है जैसे एक-एक ईंट उठाकर इधर से उधर रखते रहने के बाद अचानक ईंट के ढ़ेर को देखकर यकीन कर पाना मुश्किल होता है कि उतनी ईंटें हमने ही वहां उठाकर रखी है. ईंटों में से कोई एक ईंट हमें याद आती है और हम रोमांचित होते हैं. इतनी छोटी छोटी घटनाओं को समेट कर बना एक पहाड़ क्या मेरा ही है!

अगर शर्त यह है कि पहले वाले को मारकर ही आगे बढ़ा जाए तो संशय है. संशय इस बात को लेकर है कि पहले वाले के मर जाने की पुष्टि कैसे हो! वह आदमी जो डरता रहा, जो छिपता रहा, जो कठोर रूप से खुद को अनुशासित और नियमन के तहत रहा, जो ईमानदार रहा और जो बहादुर भी रहा, जो आध्यात्मिक रहा और जो एकला चलो रे के सिद्धांत पर जीता गया, जो हमेशा वफादार रहा और आत्मविश्वास सो लबालब रहा, उस आदमी के मर जाने की पुष्टि कैसे की जाए! इतना तय है कि वह आदमी अब आगे इस जीवन का बोझ उठाने में सक्षम नहीं है! लेकिन वह मारने से मर भी तो नहीं रहा है!



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