Wednesday, December 23, 2015

परदे पर...


                                                 बेकाबू चीख
                                          मन कस्तूरी रे, जग दस्तूरी रे

"स्साला ये दुख काहे खतम नहीं होता है रे..."

दीपक चीखता है रहते रहते अचानक. दोस्त लोग उसपर लपकते हैं उसको संभालने के लिए थोड़ा थोड़ा वैसे ही जैसे राहुल पर उसके दोस्त लोग लपके थे जब वह अपने भाई के चिता पर मल देना चाहता था खुद को. अच्छा फिल्माया गया है फिल्म में. कैमरा अचानक ऊपर जाता है और वो दूर राहुल भागकर चिता तक आता हुआ दिखता है. दबी चीख निकलती है...भैयाsssssss फिल्म का टाईटल सवाल करता है, "क्या यही प्यार है"!

मसान में वह लड़का श्मशान भूमि पर जैसे चीखता है वह अप्रत्याशित है. यह चीख कमोवेश अनवर फिल्म के उस डायलोग से भी मिलती जुलती है जिसमें वह कलाकार किसी ऊंची जगह पर जाकर चिल्लाता है

"भिखारी नहीं हूं मैं..."

इस दोनों संवाद में एक समानता है कि दोनों की हवा में उछाली गई बात है जो किसी को निर्देशित नहीं है. बिना निर्देशित बात. आम तौर पर अंदर होती है लेकिन अब बाहर होने लगी है.


                                           ये स्साला दर्द खत्म काहे नहीं होता है बे...




                                                      भिखाड़ी नहीं हूं मैं...

जब वह लड़की जाने लगती है तो पाठक रोते हुए कहता है, "हम फिट नहीं हो पाते हैं न कहीं (I don't fit in your family anywhere)".

पाठक पर दया इसलिए आती है क्योंकि वह बेटी को बेटे की तरह ही पालता है. बेटी को पढ़ने भेजता है और आजादी देता है. पाठक पर दया आती है. पुलिस वाले को तीन लाख रुपये की पहली किस्त अपना फिक्स डिपॉजिट तुड़वा के देता है. ओह!

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जिंदगी एक अभ्यारण्य तलक बन चुकी है। बियाबान और झाड़ियों के पीछे एक भूतहा घर है। घर के ऊपर सिसकोहरे की लत्तियां फैली है। रात में घर सफेद लगता है दूर से देखने पर और दिन में प्रखंड कार्यालय की गंदी पीली दिवारों जैसा। हां यह अभ्यारण्य ही है!

वो दूर एक चौड़ है, जहां खामोशी सपरिवार रहती है। कभी कभी उसके बच्चे अभ्यारण्य तक आ जाते हैं।

ये तुम बार बार क्या देखते हो मोबाइल में? 

तुमने सुकरात के बारे में सुना है! कहते हैं बहुत ही कुरूप थे। एक बार आइना देख रहे थे तो एक शिष्य ने पूछ लिया कि बार बार आईना क्यूं देखते हैं। सुकरात गंभीर हो गए, कहा कि वह अपनी सूरत को बार बार निहारते हुए सोचते हैं कि ऐसा क्या गुण वह अपने अंदर लाएं कि उनका शक्ल अप्रासंगिक हो जाए।

ऐसा क्या करूं कि 2003 से ज्यादा लोग 2014 को देखें। क्या ऐसा करूं कि उस भाई के अपराध पर किसी की नजर ही जाए मुझसे छिटक कर!

मोबाइल में कुछ लोग हैं। मोबाइल एक घर है। व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर वगैरह खिड़कियां हैं, जहां झांककर देखता हूं कि कोई आया तो नहीं!

आंसू बहाने के लिए होते हैं न कि सोखने के लिए। आंसू बहता हुआ देखकर कोई इस तरफ से उस तरफ हो सकता है। अगर कोई खामोशी से खुद को सोखता जा रहा है तो जाए अपनी बला से। रोओ, चिल्लाओ, गिड़गिड़ाओ और अपनी बेबसी और मजबूरियां गिनाओ और जीत लो उसे। मर जाओ! 

ये राॅ दौर है। करीब करीब सबकुछ राॅ में हो रहा है। तेज। बहुत तेज। लोग आते जा रहे हैं, जाते जा रहे हैं। रूक कोई नहीं रहा पलभर के लिए भी। आपसी संवाद में विराम नहीं है। अब संवाद नहीं चैट है। पहला खत्म, दूसरा शुरू। दूसरा खत्म, पहला शुरू। विराम अस्वीकार्य है! सोच अब अनुभव में तब्दील हो चुका है। जवाब सोचकर नहीं अनुभव से दिए जाने लगे हैं। सरपट और सपाट। यह प्रौढ़ दौर है, जहां सबकुछ परिपक्व है।

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