Sunday, November 29, 2015

पल दर पल

                                                     तीसरा साल

हानंदा एक्सप्रेस उतनी डरावनी कभी नहीं थी. शीतलहरी में चादर फेंकते हुए किसी सनकी की तरह खगड़िया में गाड़ी छोड़ दी थी.

अंगूठी का राज ऐसे सामने आकर भी खुल न सका. हाय रे भरोसा!
सोचता हूं कभी-कभी इतने अनुभवों का क्या काम आएगा बाकी बची एक तिहाई जिंदगी में!

खगड़िया जाना पहचाना स्टेशन नहीं था बेगूसराय की तरह. बर्बर सितम ढाहने के बाद थोड़ी रहम बरती थी किसी ने और मेट्रो की तर्ज पर दूसरे ट्रेक पर वापसी की महानन्दा आकर खड़ी हो गई खगड़िया से वापस बेगूसराय ले जाने के लिए. तड़के साढ़े तीन बजे.

पता है अगर उस दिन अगर कटिहार की छूते हुए यह सनक पूर्णियां तक पहुंच जाती तो क्या होता!

तीन साल बाद एक तरफ कितना कुछ बन गया और दूसरी तरफ कितना कुछ बिगड़ गया न! पॉजीटीव होना एक कला है, जो सीख न पाया इस कला को वह तरस का पात्र रहता है.

खैर, अऩवर देखा मैंने तीसरी सालगिरह के मौके पर. यूएस वीजा और बैंक पीओ में ज्यादा फर्क नहीं दिखा हमें!

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प्रिय अऩवर,
                  रोना आया तुम्हारे हाल पे. कुल मिलाकर आकलन किया तो लगा कि तुम्हें सबसे ज्यादा दर्द तब हआ होगा जब मेहरू तुम्हारे सामने से अंतिम दृश्य में गुजरी होगी.

                  जो क्रूर परिणति प्यार की होती है वही तुम्हारे साथ हुआ अनवर. मिलते-मिलते चीजें अनंत छोड़ पर जाकर ओझल होती है और तसल्ली हो जाने पर कि वह ओझल हो चुकी है चीजें तेज सरसराहट के साथ किस्तों में आंखों के सामने से गुजरती रहती है.

                  तुम्हारा हाल नहीं देखा गया अनवर. अंतिम दृश्य में मरने से पहले तुम तब मरे थे जब पहाड़ के पीछे मेहरू को उसके साथ देखा था. कुछ नहीं होने का एहसास दरअसल वही होता है जब तिनका भी खिसकने लगे और उसपर भी बस नहीं चले. तसल्ली यह हुई कि तुम मर गये. मेहरू ने अपने गले में फंदा डालकर वैसे भी तुम्हें एक और मौत दे ही दी थी. इतनी मौत लेकर जीकर भी क्या करते अऩवर!

                   अऩवर, एक बात बताता हूं. तुम्हारी कहानी न केवल सच्ची है बल्कि अनोखी भी है. तुम्हारे दोस्त ने छल किया लेकिन उसकी भी अपनी कमजोरी या मजबूरी होगी. मजबूरी मेहरू की भी होगी. सपने हैं अच्छी बात है लेकिन उस तरह का सपना थोड़ा अटपटा लगा.

                  अगर मेहरू अपने दम पर कुछ हासिल करके यूएस जाने की ख्वाहिश रखती तो मैं उसकी तरफ से ही सोचता अनवर. लेकिन वह किसी और के मेहनत को अपनी उस उपलब्धि के साथ भुना रही थी, जिस उपलब्धि में उसका कोई योगदान नहीं था. उसकी खूबसूरती अल्लाह ने बख्शी थी और तुम उसी पर मरे जा रहे थे. इतना तो लगा कि वह तुम्हारे साथ खुश नहीं रह पाती लेकिन तुम थोड़ा और कठोर होते तो कम से कम तुम्हें पश्चाताप तो नहीं होता आखिरी वक्त में!

                  माफ कर देते उसे! पता है तत्कालीन परिस्थिति में तुमने वही किया जो 5 दिसंबर, 2012 को बाघी में किया गया था लेकिन तुमसे थोड़ी अपेक्षा कर रहा हूं क्योंकि तुम एक सिनेमा के किरदार हो. रोकना असंभव सा होगा तुम्हारे लिए फिर भी!

                 अनवर, अगर फिर जनम लेना तो संभल कर रहना यार. देखा नहीं जाता इतना सबकुछ इस तरह से! पूरे चार बार मरे तुम इन तीन घंटों में!

                                                                                            एक शाम!


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