Thursday, November 12, 2015

बारी बारी से


                                       चलते फिरते मरते लोग

ही पिछले कुछ दिनों पहले पता चला था कि मृगेन्द्र मनीषी को दिल का दौरा पड़ गया और वह बीत गये. आज सुबह फेसबुक से पता चला कि अरुण कुमार भी अब नहीं रहे. अरुण सर पिछले काफी समय से कैंसर का डट कर सामना कर रहे थे. उनके फेसबुक स्टेटस से उनकी कराह की आवाज सुनाई देती थी. न लाईक करने का मन करता था न कमेंट करने का, मन करता था कुछ वक्त उनके साथ बैठकर बिताने का, जो हो न सका.

मुंबई के टाटा कैंसर अस्पताल में जाने के दौरान कई बार कैंसर पीड़ितों के हाल को देखा है. कई के परिजनों से बात करके लगा कि अब उनकी जिंदगी बिल्कुल ठहर चुकी है और अब इसके आगे बढ़ने की कोई गुंजाइश बाकी नहीं है.

एक दृश्य ऐसा देखा था जिसमें एक नवविवाहित महिला रो रही है और उसका पति उसे ढाढस दे रहा है. यह समझना मुश्किल हो गया कि कैंसर ने उन दोनों में से शिकार किसको बनाया है. काफी देर तक उन्हें एकटक देखता रहा फिर वहां से निकल गया. पूरे रास्ते एक संन्यासी की तरह जीवन के रहस्यों के बारे में सोचता हुआ परेल लोकल स्टेशन तक आया.

अरुण सर से शायद पहली बार भौतिक मुलाकात बेगूसराय के पावर हाऊस में रामाश्रय सिंह(सर) के घर पर हुई थी. वह पीयूसीएल के किसी काम के सिलसिले में शायद वहां आए थे और मैं तब वहीं बैठा हुआ था. टाइम्स ऑफ इंडिया पढ़ते हुए कई बार उनसे आभासी मुलाकात हो जाती थी लेकिन यह नहीं जानता था कि उनसे इस तरह संयोगवश मुलाकात रामाश्रय सर के घर पर हो जाएगी.

जब उन्हें पता चला कि मैं इग्नू से ह्यूमन राइट्स की पढ़ाई कर रहा हूं तो वह खुश हो गये. उनकी स्वाभाविक उत्सुकता हुई यह जानने में कि मैं बैंंकिंग, एसएससी, रेलवे वगैरह की तैयारी न करके ह्यूमन राइट्स की पढ़ाई क्यूं कर रहा हूं! वह भी बेगूसराय में रहके. न कोई करियर न कोई प्रत्यक्ष वजह! उनके साथ के अपने अनुभव के आधार पर इतना जरूर बता सकता हूं कि वह एक जीवित इंसान थे, जिसके अंदर जीवन था. वह जीवन कई लोगों के काम आया और बतौर संस्था पीयूसीएल और प्रेस काऊँसिल जैसी बड़ी संस्था के काम तो आया ही.

मेरे लिए उनका जाना इस वजह से भी दुखद है क्योंकि बेगूसराय के कस्बाई पत्रकारिता में जीते हुए अगर मैं अंग्रेजी पत्रकारिता करने की चाह पाल रहा था तो हिम्मत दो लोगों ने ही दी थी. पहले थे मृगेन्द्र मनीषी, जो कि बेगूसराय में हिन्दूस्तान टाइम्स के रिपोर्टर थे और दूसरे थे अरूण कुमार. अब दोनों की सिर्फ स्मृतियां शेष रह गई है.

दिल्ली-मुंबई के बीच की जिंदगी में कई अहम जवाबदेहियां निभाने से चूकता जा रहा हूं. ऐसी ही एक जवाबदेही थी अरुण सर से ऐसे समय में मिलना जब उन्हें लोगों की जरूरत होगी. लेकिन वैसा नहीं हो पाया. अफसोस रहेगा इसका लेकिन खुशी भी रहेगी इसकी कि उनसे मैं कई मौकों पर मिला और वह मुझे निजी तौर पर जानते और मानते थे.


1 comment:

  1. भली और नेक यादें रह जाती हैं हमारे साथ ...

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