Tuesday, November 10, 2015

समय से संवाद

                                           न धूप चुने न छांव

संशय अच्छी चीज नहीं है. तय करना कठिन यही संशय बनाता है. यह चाहिए लेकिन वह भी, और अगर उसके बिना चाहिए तो उसकी संरचना ऐसी न होकर वैसी हो, और अगर संरचना वैसी न भी हो तो ये सब ऐसी परिस्थिति में हो और अगर वैसी परिस्थिति में न भी हो पाए तो कम से कम इसमें उसकी रजामंदी हो जाए और रजामंदी न होने की स्थिति में वह उसे उस तरह कर ले.

संशय, असमंजस, संदेह, जिज्ञासा या डर ये सब किसी प्रसंग, गाथा, कथा, सुखांत या दुखांत में निर्णायक भूमिका निभाते हैं.

देर से जागा आदमी समय से तेज भागना चाहता है. भागता है. इस दौरान कई घटनाएं अस्वाभाविक भी होती हैं और कई स्वाभाविक भी. समय का बंटवारा सही से नहीं हो पाता है और विकृतियां अपनी जगह बनाने लगती है. बेचैनी बढ़ती है तो तालमेल और बिगड़ता है और समय रहते संतुलन में नहीं कर पाने के कारण संशय एक नासूर की तरह धमनियों में जम जाता है और समय-समय पर पूरी मशीनरी को झटका देता रहता है.

दिल का दौरा पड़ने की यह कोई उम्र नहीं है, फिर भी ऐसा कहीं वर्णित तो नहीं है कि इसकी कोई उम्र निर्धारित है.

समय और समय के बीच ही प्रतिस्पर्धा है. हर आदमी समय से आगे बढ़ चुका है. अंदर का समय और बाहर के समय के बीच का तादात्म्य इस कदर बिगड़ा हुआ है कि उसे वापस ठीक करना इस हद तक खतरनाक है कि उसके बारे में सोचा जाने पर ही संशय है.

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