Tuesday, November 3, 2015

जीवन की दूसरी किस्त


                                  
              “हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते.....”


किस्तों में जिया गया जीवन व्यर्थ सा ही लगता है फुरसत में सोचने पर. सपने ही सपने!

दो साल पहले नवंबर में जीवन की पहली किस्त खत्म हुई थी. अपमान! क्या सच में अपमान ने मुझे ऐसा बागी बनाया! मोबाइल में ताबड़तोड़ रिंग, लैपटॉप के की-बोर्ड पर उंगलियां थिड़कने की आवाजें, ट्रेन के ट्रेक बदलने की खूंखार आवाज, कुछ धुन और अपने अंदर उठे जलजले के शोर के साथ तीन साल पहले नवंबर में जीवन की एक किस्त खत्म हुई थी.

क्या मिला क्या खोया! इसका लेखाजोखा करने के लिए अगर कभी वक्त मिले तो जरूर करूंगा. आंकड़े तैयार रखे हैं डायरी के पन्नों में और उन जगहों पर जहां मैं बैठे-बैठे लिखते रहता हूं ऐसे ही. सबको जोड़कर निकालूंगा कि नफा हुआ या नुकसान.

अगर जीवन में एक पत्नी मिली, जिसे ब्लैक टी बनानी आती हो और जो देर रात भी बिना दो बात सुनाए एक कप चाय बना दे, तो एक उपन्यास जरूर लिखूंगा। अपने जैसे लड़कों के लिए, जो अपनी तरह रहने की कीमत हमेशा चुकाते रहे!

महानगर में सालों से अकेले पड़े किसी कमरे में दरवाजा की कुंडी लगाकर आप पढ़ाई करते-करते कुछ से कुछ बन जाते हैं. पता ही नहीं चलता कि गलीकुची से निकलते-निकलते कब आप हाई-वे पर आ गये और फिर आपको अचानक अपने आसपास सन्नाटा महसूस होने लगता है. जबतक आप उस सन्नाटे की आवाज महसूस करते हैं, आपको ऐसा लगने लगता है कि आपसे नियंत्रण छूट रहा है. आप पूरी ताकत लगाकर उस दिशा की ओर बढ़ना चाहते हैं जो आपने तय की है, लेकिन प्रतिरोध बढ़ता जाता है. अचानक आपको ऐसा लगता है कि कोई आपकी मदद करना चाह रहा है. वह कौन है बिना जाने आप तालमेल बिठाते हैं. यहां से एक किस्त शुरू होती है जो मंजिल से पहले किसी मोड़ पर आकर खत्म हो जाती है. फिर दूसरी किस्त शुरू होती है. सफर चलता ही चलता जाता है.

मंजिल से पहले क्या किस्तें ही चलेंगी या फिर एकमुश्त किसी का निवेश जीवन में होगा?

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देर से...

जो भी हो,
        पता चला कि तुम्हारी सहानुभूती थी लेकिन हुिम्मत करते करते रह गई तुम. डेंगू को निपटा कर वापस मैं फिर से जब बीमार पड़ा तो मुझे भी किसी की सहानुभूति चाहिए थी।

उस सिस्टर ने मुझे सुनाया। कहा, कोई अटेंडेंट क्यूं नहीं बुला लेते हो। जब वो चली गई तो सोचा मैंने उसने जो कहा उसका मतलब। फिर डायरी लिखने लगा। भैया का फ्लाईट लेकर भागा भागा आना दिल को छू गया। लगा कि कोई है!

        दूसरी किस्त में जीवन का एक भी खत्म हो गया, अगर खत्म हुआ तो. मैं नेगेटिव हूं और सबको पता है मेरी नेगेटिविटी के बारे में. मैं एक ऐसा विमान उड़ा रहा हूं जिसके पंख जल चुके हैं. मैं भले इनकार करूं या करता रहूं लेकिन महसूस करता हूं कि उस जहाज में कई लोग बैठे लोग बैठे हैं, जिन्हें सुरक्षित कहीं उतारना मेरी जवाबदेही है. कुछ लोग बिसरते जा रहे हैं या फिर वो सदमा नहीं झेल पा रहे हैं और टूटकर खत्म होते जा रहे हैं. मैं उनका मातम मनाऊं या बचे हुए लोगों को उसी ऊर्जा के साथ बचाने की कोशिश करता रहूं!

पलट कर देखने पर अभी कुछ-कुछ नजर आ रहा है. आलीशान से लगने वाले उस गेस्ट हाऊस में छनक, पीले होकर झड़ रहे पत्तों के बीच करीब आधा किलोमीटर तक चलना, रखकर सेल्फी लेना, दिल्ली के पुराने किले में बोटिंग, और बहुत कुछ नजर आ रहा है अभी.

मैं खुद का गर्लफ्रैंड हूं।

ऐसा है जैसे कोई बेटी ससुराल जाने से पहले पलट पलट कर अपने घर को देख रही हो. आह...

जाते-जाते चीजें बहुत दूर चली जाती है. गौर से देखने पर कुछ शब्द तैरते से दिखाई देंगे कभी. तुम्हारा "कहां" और मेरा "हां बोलो"! थोड़ा थोड़ा वैसे ही जैसे लू में रेल की पटरियां लहकती हुई दिखती हैं.

हर पल बीतता है यह भी बीत जाएगा. बीतेगा न!

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जो है...

लोग अब दूर-दूर तक नहीं हैं. बस इधर-उधर उड़ते शब्द हैं. वाक्य है. कथन है. सलाह है. ये किनके मुंह से कब निकले और वह मौका कौन सा था यह अब दिखता नहीं.

"तुमसे ज्यादा कनफ्यूज इंसान मैंने दुनिया में नहीं देखा अबतक, तुम्हें पता ही नहीं है कि तुम्हें करना क्या है", यह बात घुमी हुई सी कहीं लहराती दिखती है. ठीक से याद करता हूं तो एक साथ कई मुंह इसे बोलते हुए आंखों के सामने आ जाते हैं. अलग-अलग तरीके से न जाने कितनों से ऐसा कहा था.

लोगों का न होना एक शून्य पैदा करता है. शून्य में शांति होती है तो डर भी होता है.

बोल लेना बड़ी बात है. लिख लेना अब उससे भी बड़ी बात है. और सोच लेना तो एक उल्लेखनीय उपलब्धि है अब, एक ऐसी उपलब्धि जिसपर खुद को यकीन दिलवाने में जरा वक्त जाया होता हो.

29 नवंबर की वह रात उतनी डरावनी नहीं थी जितनी 1 नंवंबर का यह दिन रहा.


सिलसिला जारी है...

       
                         

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