Saturday, June 20, 2015

समय से संवाद



                                               रहें न रहें हम...


कामिनी को उसका पिता पुचकारते हुए समझाता है कि वह उसकी भलाई के लिए ही वैसा कह रहा है. वह आगे कहते हैं कि बादल अगर निकम्मा न होता तो वह उसको उसके गले बांध भी देता! 

यह मिलाजुला कर वैसे ही है जैसे फिल्म कयामत से कयामत तक में जब जूही चावला और आमिर खान भागकर एक पहाड़ की चोटी पर रहने लगते हैं तो मौका पाकर जूही चावला का पिता वहां जाकर जूही चावला को अकेले में बहला लेता है.

हालांकि ऐन वक्त पर आमिर खान के परिवार वाले के वहां आ जाने के कारण कहानी कुछ और हो जाती है लेकिन तबतक जूही चावला बहल चुकी होती है.


आरजू फिल्म का एक दृश्य
इऩ सब दृश्यों की चर्चा करते हुए ध्यान आता है कि तुम्हारे बड़े पापा ने तुमसे कहा था कि अगर मैं बैंक पीओ होता तो वह रिश्ते के लिए मान जाते!

लड़कों पर हमेशा लड़कियों को बहलाने के आरोप लगते रहे हैं लेकिन हिंदी फिल्मों में अबतक शायद ही ऐसी कोई कहानी बनी है जिसमें बहलाने की भूमिका में कोई हीरो रहता हो, अक्सर घरवाले ही रहते हैं. चाहे वह सुपरहिट रही फिल्म धड़कन हो या फिर ब्लैक एंड व्हाईट में दिलीप कुमार की आरजू या कयामत से कयामत तक.

बादल अपनी भाभी द्वारा दी गई खाने की थाली से जब एक निवाला मुंह तक लाता है तभी उसका जमीर उसे धिक्कारने लगता है और वह तीन सेकंड तक निवाला होठ के पास रखकर उसे वापस नीचे पटकने की शैली में रख देता है.

दर्द के कई रूप हैं. दर्द अथाह है. अनंत है. असीम है और असीमित है. लेकिन जो दर्द दो आत्माओं के एक दूसरे से अलग होने में है वह अवर्णित है. 

कोई पौधा अगर खिड़की के छड़ या किसी रस्सी के सहारे लंबा होता है तो उसकी कुछ रेशाएं उससे लिपटती जाती है. मसलन कद्दू, खीरा, तरबूज या फिर कोई भी लत्ती. ऐसे पौधों की लत्तियों को जब सहारे से हटाया जाता है तो वह टूट जाती है या फिर अलग होने पर भी अपना आकार नहीं छोड़ती है. इसे हटाने के लिए अतिरिक्त सावधानी की जरूरत होती है. 

प्यार ऐसा ही एक पौधा है जो परस्पर होता है.

इसके अलावे एक और चीज है जो दिखती है. प्यासा और आरजू में एक चीज कॉमन है कि हीरो के मर जाने का भ्रम अन्य किरदारों को होता है. प्यासा में इसे बहुत ही मार्मिक तरीके से चित्रित किया गया है. रेल के ट्रेक में पैर फंसे होने के कारण एक भिखारी ट्रेन से कट जाता है लेकिन सबको भ्रम होता है कि गुरूदत्त जो कि एक शायर है, वह कटकर मर गया है. 

उसकी शायरी के फिर चर्चे होते हैं और फिर वह उभर कर छा जाता है. इस तरह ताउम्र जिल्लत से जीने के बाद उसे राहत मिलती है लेकिन तबतक वह जिंदगी से पूरी तरह रूठ चुका होता है और एक कोठेवाली के नाम अपनी जिंदगी कर देता है.

समय एक बेहद बेवफा चीज है जो किसी का नहीं रहता. बादल की चिट्ठी उसकी कम्मो तक पहुंचने से पहले एक सिगरेट जलाने के काम आती है. यह सिगरेट और कोई नहीं बादल का भाई ही पी रहा होता है और पहले कश के बाद वह बादल के मर जाने का जिक्र करता है.

ठाकुर की कामिनी से शादी हो जाती है. बादल कामिनी और गांव वालों के लिए मर चुका है.

वह कामिनी जो बादल को एक दिन सूटबूट में देखने की बात उससे करती थी, वह एक समय बाद ठाकुर के नए सूट को सहलाती हुई उससे मधुर बातें कर रही होती है. 

यह सब हो रहा होता है और दर्शक इसे देखता है. इसी बीच कामिनी को अचानक एक दौरा सा आता है और वह ठाकुर को झटक देती है. फिर पलट कर भागने लगती है उसी घर में किसी ओर. शायद ठाकुर के सूट को सहलाते हुए उसे बादल के साथ की हुई बातें याद आ रहीं होंगी.

प्यासा फिल्म के एक दृश्य में गुरूदत्त
बिछड़े लगाव में एक दर्द स्थायी होता है. वह है जगह का दर्द. सबकुछ बीतने के बावजूद जगह स्थाई होता है. 

जैसे बेगूसराय स्थाई है. आर्या प्लाजा स्थाई है. स्थाई है ज्ञान गंगा जहां से मैंने नया कार्डबोर्ड लिया है और स्थाई है वह सड़कें, वह सुभाष चौक, वह आहार उत्सव, वह बेगूसराय का बस स्टैंड, वह प्रियंका जेनरल स्टोर जहां से कुछ चूड़ियां ली थी मैंने और स्थाई रहेगा वह पेट्रोल पंप भी जहां मैं वारिश से बचने के लिए इंतजार कर रहा था. 


कितनी डरावनी और घनघोर वारिश थी वह!

बादल जब वापस गांव आता है तो उसे भूत समझकर उसका साथी उससे डरकर बैलगाड़ी छोड़कर भाग जाता है. मुश्किल से उसे यकीन आता है कि बादल जिंदा है. बादल को पता चलता है कि कामिनी की शादी हो चुकी है ठाकुर से. 

वही ठाकुर जिसके खेत का फल एक दिन कामिनी उसके लिए लाई थी और उसका माथा ठनका था. बादल बदहवाश की तरह भागता है वैसे ही जैसे क्या यही प्यार है में राहुल अपने पिता के मौत का पोस्टर देखकर भागता है फिल्म के अंत में.

इधर कामिनी को बात पता चलती है तो वह कहती है, राम करे कि वह मुझे भूल ही जाए. लड़की को समझना यहीं पर जटिल होने लगता है और यहीं पर मनोविज्ञान की सारी थ्योरी धरी की धरी रह जाती है.

कामिनी को गोली लगती है और वह मर जाती है. अगर गोली कामिनी को नहीं लगती तो बादल को लगती क्योंकि ठाकुर बादल को ही मारने आया था. कामिनी बेवफा नहीं थी. एक भ्रम था जो सबकुछ लीलता गया और आखिर में जब कुछ नहीं बचा तो किसी एक की बलि की दरकार थी जो कामिनी ने पूरा कर दिया.

प्यार क्या हैप्यार एक संतुलन है. जहां संतुलन नहीं है वहां प्यार नहीं है.




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