Wednesday, June 10, 2015

जीवन की पहली किस्त


                                               
                                                रहें न रहें हम...


कई बार ऐसा लगता है कि अब वक्त हो चला है कि अंगड़ाई ली जाए! ठहराव जरूरी है. इसे महसूस करने के लिए तजुर्बा चाहिए बस. लगातार चलते रहने से तालमेल बिगड़ जाता है और एक तरह का एडिक्शन हो जाता है चलने से. और फिर मंजिल को छूते हुए हम आगे निकल जाते हैं इसकी परवाह किये बिना कि मंजिल तो पीछे ही छूट गया!

तुम्हारा साथ न मिलना अफसोसजनक रहा. मैं तुम्हें डिजर्व नहीं करता था या तुम मुझे, यह अंतहीन बहस है जो मैं खुद से कई बार करता हूं और थक कर फिर बीच बहस में ही हट जाता हूं.

जॉब महत्वपूर्ण है. जॉब से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं बैंक पीओ होना और वह भी कुछ टर्म एंड कंडीशन के साथ.

जिंदगी इतनी जटिल क्यूं बनने देते हैं लोग कि कल उनकी ही पीढ़ी का कोई हिस्सा उसमें फंसकर घायल हो जाए.  निहत्थेपन में आदमी दार्शनिक होकर बहुत कुछ सोचता है. मैं भी. मंदिर में, लोकल में, सड़क पर, गाड़ी पर, कोर्ट रूम में बैठे हुए और हर उन जगहों पर जहां सिर्फ मैं होता हूं, सोचता हूं. यह कि क्या होता अगर हम कभी न मिले होते! क्या होता अगर मैं थोड़ा धैर्य रखता!

धैर्य जरूरी है.

ऐसे वक्त में जब शब्द खो गये हैं, वाक्यों का विन्यास नहीं बन पा रहा है. सोचने की क्षमता का लोप होता जा रहा है और आसपास की शांति पहले से ज्यादा डरावनी हो रही है. इस घने वियावान से लगने वाले निहत्थेपन में मैं तुम्हें सोचता हूं कभी-कभी.

मेरे साथ ही मेरा सोचा हुआ भी दफन हो जाएगा या जलकर खाक हो जाएगा एक दिन. सबकुछ खत्म हो जाएगा एक दिन. उस दिन के बाद न शाम होगी न रात.

तबतक सबकुछ चल रहा है.


मरीन ड्राइव, मुंबई.                                       साभार : विकी, कैमरामेन, दूरदर्शन

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