Tuesday, February 3, 2015

दुनिया मेरे आगे



                                 कैंसर के समांतर चलती जिंदगी


ऐसे समय में जब मैंने सोचना करीब-करीब पूरी तरह छोड़ दिया है, लिखना तनाव मोल लेना ही है. आ बैल मुझे मार जैसा कुछ! क्योंकि लिखने के लिए सोच का संग्रह चाहिए जिससे थोड़ी-थोड़ी मात्रा में आप उसे निकालकर शब्दों में अनुवादित करके परोस दें. बिना सोचे लिखने का यह नया अनुभव है!

पहले भी कई बार कुछ ऐसी महिलाओं को देखा था जिनके सर के बाल मुड़े होते थे या बहुत छोटे होते थे. कभी जिज्ञासा नहीं हुई जानने की कि उन महिलाओं ने ऐसा क्यूं किया!

ऑफिस के गेस्ट हाऊस के जिस डॉरमेट्री में फरवरी से अप्रैल तक ठहरा था वहीं मुझे यह पता चला कि कीमो लेने के बाद उसके असर से बाल झड़ जाते हैं. कीमो में सांप का जहर होता है ऐसा उनके पति ने बताया. कीमो कैंसर रोगियों को दिया जाता है ऐसा मैंने कुछ लोगों को कहते हुए सुना था.

एक आदमी जिसे यह पता हो कि वह कभी भी मर सकता है, उसके लिए जीना कैसा होता होगा?

दस विदानियां फिल्म की तरह वह भी अपने सपने साकार कर लेना चाहता होगा या फिर मुन्ना भाई एमबीबीएस के उस मरीज की तरह अस्थिरता के चरम बिंदू पर जाकर दोलन करता होगा. या फिर संभव है कि सफर फिल्म के राजेश खन्ना की तरह बची जिंदगी कल्पना के सागर में रम जाना चाहता होगा.

उस दंपति में जो मैंने महसूस किया वह इन सबसे अलग था.


पति के चेहरे पर कभी चिंता नहीं दिखी लेकिन यह हमेशा महसूस होता रहा कि उसके अंदर एक और पति है जो हमेशा रो रहा है. पत्नी के चेहरे पर कभी कैंसर का डर नहीं दिखा लेकिन हमेशा लगता रहा कि वह सबकुछ समझ रहीं हैं.

आदमी कितना भी कोशिश कर ले स्त्री जैसा धैर्य नहीं धर सकता. स्त्रियों के साथ अबतक के व्यवहारिक अनुभवों से मैं कई बार इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं.

एक रोज दफ्तर के बाहर वह जोड़ा मिल गया. पता नहीं क्या मन हुआ हम तीनों पास के एक मंदिर चले गये. मंदिर में हम तीनों ने थोड़ा समय बिताया. मैं छुप-छुप कर उस महिला को देखता. काफी कोशिश करने के बाद भी मुझे उनकी आंख में वह नहीं दिखा जो मैं देखना चाह रहा था. कोई बेबसी नहीं!

उनके पति से पता चला कि वह भी सरकारी नौकरी में हैं और कैंसर से पीड़ित होने के बावजूद न केवल दफ्तर का काम आम सहकर्मियों की ही तरह करती हैं बल्कि घर भी देखती हैं, वैसे ही जैसे अन्य महिलाएं देखती हैं.

फिर रुक क्या रहा है?

इस सवाल पर आकर मैं ठहर जाता हूं. आखिर क्या है जो रुक गया? सिवाय इसके कि वह कभी भी निर्जीव हो सकती हैं ऐसा क्या है जो उन्हें बाकी महिलाओं, बाकी पत्नियों, बाकी मांओं या फिर बाकी महिलाओं से अलग कर रहा है? कुछ भी तो नहीं!
फिर?

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कई बार यह सोचता हूं कि सरकारी नौकरी की तरह ही अगर जिंदगी में भी वीआरएस यानि स्वैच्छिक सेवानिवृत्त का विकल्प होता तो समाज कैसा होता! फर्ज कीजिए कि किसी की एक बेटी है और उसका सपना है कि वह उस बेटी की शादी किसी आईएएस से कर दे. उसका सपना पूरा हो गया.

इसी तरह किसी का एक बेटा है और वह उसे पायलट बनाना चाहता है. मान लीजिए उसका बेटा पायलट बन गया. इसी तरह वैसे लोग जिनके सपने पूरे हो गये तो वह बची नौकरी का भला क्या करेंगे?
जिंदगी में सपना देखना और उसे पूरा करना ही सबकुछ है.

जो लोग सपना नहीं देखते और ऑटो मोड पर चलते जाते हैं वह पता नहीं कैसी जिंदगी जीते हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि उनकी जिंदगी कम से कम उन लोगों की जिंदगी से अच्छी होती होगी जिन्होंने जवानी में सपने देखे और फिर उसे जवानी में ही पूरा कर लिया लेकिन फिर वह दूसरा सपना नहीं देखना चाहता.

सपने की कीमत होती है.

एक सपने के लिए दूसरे सपने की कीमत भी देनी होती है. मान लीजिए किसी लड़के ने किसी लड़की को चाहा लेकिन वह लड़का प्रोफेशनली वह नहीं बनना चाहता है जो उस लड़की के परिवार वाले चाहते हैं. ऐसे में लड़के को अपने दो सपनों ने किसी एक को ही चुनना होगा. वह जीत जाता है लेकिन फिर बाकी जिंदगी के लिए उसका कोई मकसद नहीं रह जाता क्योंकि वह सपने देखना छोड़ देता है इसलिए नहीं कि सपनें वह देख नहीं पता बल्कि इसलिए कि वह अपने सपनों को विकल्प के रूप में नहीं देखना चाहता!

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पटना के उस परिवार ने जिस तरह कैंसर को बिल्कुल भाव ही नहीं दिया है, ऐसा लगता है कि जिंदगी की अब वास्तविक कीमत उतनी नहीं रह गई है कि लोग इसे खोने में डरते हैं. अब जिंदगी बस कटने और कटते जाने का नाम है.
कैंसर अगर बिना दर्द का वीआरएस होता तो कितना अच्छा होता.

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और आखिर में जब मैं उन्हें दादर स्टेशन पर विदा करने गया तो लौटते हुए यह फोटो अपने साथ लेते हुए गेस्ट हाऊस आ गया...










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