Saturday, September 6, 2014

यादों में...



                    बीते पन्ने के लोग


मुंबई आने के बाद पीछे ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे यहां मिस किया है. सबकुछ मिलने के बावजूद कुछ है जो मिस हो रहा है का बिम्ब अब भी जस का तस है. अब तक समझ नहीं आया कि क्या है जो मिस हो रहा है!

करीब दो साल पहले अजय मिश्रा से लिफ्ट में पहली बातचीत हुई थी. सेकेंड फ्लोर की लिफ्ट के बाहर हमदोनों लिफ्ट के आने का इंतजार कर रहे थे. वो शो खत्म करके लौट रहे थे और मैं अपनी शिफ्ट खत्म करके. दरवाजा खुला. मैं रूक गया. मैंने महसूस किया वह भी रूके थे. बिना देर किये मैंने उन्हें पहले लिफ्ट में जाने के लिए आदरपूर्वक कहा.


मंडी हाऊस में अजय कु. मिश्रा के साथ     फोटो: सिद्धांत सिब्बल
लिफ्ट का दरवाजा बंद हुआ और मेरी किस्मत का दरवाजा खुल गया.

अजय मिश्रा डीडी न्यूज के बिजनेस ब्यूरो के हेड थे. चेहरे पर तेज था और आदमी थोड़ा जुनूनी टाइप के लगते थे. कम से कम लोगों से कामभर बातचीत और हमेशा पढ़ते रहने की आदत ने ही मुझे उनकी ओर आकर्षित किया था.

अजय मिश्रा ने मुझे अनुवाद का काम देना शुरू कर दिया. ज्यादातर अनुवाद बिजनेस से जुड़े होते थे. 

मैंने उनके नजदीक पहुंचने का कोई मौका नहीं छोड़ा और आखिरकार एक समय आया जब उन्होंने अपने बिजनेस वेबसाइट के कंटेट मेनैज करने की जवाबदेही मुझे दे दी.

अब मेरा नया दफ्तर था वैशाली. मंडी हाउस से वैशाली अप-डाउन होने लगा. दोनों के ठीक बीच यानि न्यू अशोक नगर में मेरा रहना होता था तब.

इस बात की टीस हमेशा रहती है कि उनके लिए मैं जितना कर सकता था उतना नहीं किया. टीस इसलिए क्योंकि उन्होंने कभी इसकी शिकायत नहीं की. अगर कभी कुछ कहा होता तो यह टीस कतई नहीं होती.

उनसे मिलने के बाद धीरे-धीरे अन्येन्दु सेनगुप्ता और अंशुमान तिवारी से नजदीकी बढ़ी और दोनों ही बाद में जाकर मेरी किस्मत को नई दिशा देने में निर्णायक साबित हुए.

बिजनेस जर्नलिज्म के तीन दिग्गजों के बीच रहकर बैंक की मौद्रिक नीति समीक्षा, पीएमआई रिपोर्ट, शेयर मार्केट सहित पर्सनल फाइनांस की बारीकियों को लिखने और समझने का जो मौका मिला उसे मैं अपनी जिंदगी की एक उपलब्धि ही मानता हूं.

वैशाली में मेक्सयोरमनी डॉट कॉम के दफ्तर में मेरी जगह

अगर चाहूं तब भी वो सुबह नहीं भुला सकता जब संघ सेवा के अधिकारी अन्येन्दु सेनगुप्ता ने अपने सरकारी आवास पर बुलाकर मुझे अपने बेशकीमती दो घंटे दिए थे बिजनेस जर्नलिज्म को समझाने में.

अजय मिश्रा ने अगर उस दिन मेरा फोन नहीं लिया होता तो मेरा चयन मुंबई के लिए कभी नहीं होता और मैं आज उस तसल्ली को भी नहीं हासिल कर पाता जो मैं अभी महसूस करता हूं.


अंशुमान तिवारी का ब्लॉग मेरे लिए रामबाण औषधि से कम नहीं था.

बहरहाल, अब आगे क्या होना है यह एक रहस्य सा है!


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