Wednesday, August 13, 2014

भागती भीड़ में


                                             पीछा करती धुन

ऐसा आम तौर पर होता है कि हम चलते-फिरते कहीं कोई गाना सुनते हैं और फिर देर-सवेर उसे गुनगुनाने लगते हैं.

“हम दिल दे चुके सनम” के एक दृश्य में अजय देवगन जब ऐश्वर्या राय के पास “ढोली तारो ढोल बाजे..” गुनगुनाता है तो ऐश्वर्या राय की खोज पूरी हो जाती है और वह उसी गाने के सुराग से अपने बिछड़े प्रेमी सलमान खान तक पहुंच जाती है.

लय, धुन, इन्स्ट्रूमेंट, आवाज वगैरह-वगैरह हमें कई बार हमें अतीत में ले जाकर छोड़ देता है और हमें समझ नहीं आता कि हम उससे बाहर कैसे आएं. बाहर आने की बेचैनी इसलिए होती है क्योंकि उस तराने के आसपास का जो घना पारिवारिक और सामाजिक तानाबना हम जी चुके होते हैं हमारा वर्तमान उसे फिर से दुहराने की जिद करने लगता है. इस जिद को पूरा न कर पाने की हार हम सहना नहीं चाहते और बेचैनी और घबराहट के मारे दम तोड़ने लगते हैं.

गाने की एक खास जगह होती है बैचलर लाइफ में.

इंटरमीडिएट के दिनों में फीलिप्स का एक टेप रिकोर्डर मेरे कमरे की खिड़की से चिपका रहता था. तब कैसेट का जमाना होता था और आई पॉड और चिप का कॉन्सेप्ट प्रचलन में नहीं आया था. अलताफ राजा और अताउल्लाह खान के गानों से सजे रील वाला कैसेट हमेशा बिजली आने के इंतजार में रहता था. दोनों गायक की आवाज में “बेवफाई” का गजब का दर्द होता था.

इंटरमीडिएट होने के बाद ऑनर्स का दौर आया. इस बीच घर में भी कई स्तरों पर कई बदलाव आया. शादियों के बाद घर का माहौल बदला. रिमिक्स का दौर तब तक अपने चरम पर पहुंच चुका था. “ले के पहला पहला प्यार”,“सैंया दिल में आना रे”, “परदेसिया ये सच है पिया,” जैसे गैर पारिवारिक गानें भी अब पापाजी के दफ्तर जाने के बाद बजने लगे थे. डीवीडी और वीसीडी के दौर ने भी तभी पूरी रफ्तार पकड़ी थी. चार हजार रुपये में तब मैंने डेल्टन की डीवीडी ली थी.

कैसेट का मार्केट धीरे-धीरे गायब होना शुरू हो चुका था. पचास रुपये में छह-आठ गाने वाले कैसेट दस-पंद्रह रुपये में दो सौ गाने वाली सीडी से ज्यादा दिन तक टक्कर नहीं ले सका.

कमरे में छोटी सी टीवी का साथ देने के लिए अब डीवीडी आ चुका था. साठ-सत्तर के दशक की पसंदीदा फिल्में देखने का सुरूर चढ़ा और कमरा फिल्म की सीडियों से भर गया. डीवीडी का दायरा टेपरिकॉर्डर से बहुत ही बड़ा था.

स्नातक होने के बाद टेस्ट पूरी तरह बदल चुका था. जो पैर पहले झनकार बिट्स और फास्ट ट्रैक म्यूजिक की तलाश में पूजा म्यूजिक स्टोर से लेकर सब्जी बाजार के मित्तल जी और विष्णु सिनेमा हॉल के पास के सभी सीडी दुकानों की तरफ बढ़ने का आदी हो चुके थे वो अब सर्वोदय नगर की ओर बढ़ चुके थे.

ऑनर्स के तुरंत बाद अगर मेरे साथ कुछ सबसे अच्छा हुआ था तो वह था साकेत के रूप में मुझे एक ऐसा दोस्त का मिलना जिसने मुझे सुधार दिया था. अगर मैं आईआईएमसी की इंट्रेंस निकाल पाया तो उसका श्रेय सर्वोदय नगर में रहने वाले साकेत को भी जाता है. हम दोनों ने साथ में बीएचयू की तैयारी की थी और प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की थी. हमारा परीक्षा केन्द्र कलकत्ता पड़ा था जहां से मैंने पहली हवाई यात्रा की थी.

बहरहाल, साकेत गजल में ही जीता था. “ऐ आसमां ये बता दे एक चांद मेरा कहीं खो गया है...कहां है तू उसका पता दे...” इस गजल को वह अक्सर सुनता था. उसके साथ तैयारी करते हुए मुझे पता भी नहीं चला कि कब मैं गुलाम अली, जगजीत सिंह-चित्रा सिंह और पंकज उदास का आदी हो गया. मेरे सबसे नजदीकि मित्रो में से एक सुमित भी जगजीत सिंह का बहुत बड़ा बड़ा फेन था.

गजल का दौर लम्बा चला और अगर यह कहूं कि वह दौर अब तक चल रहा है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं होगा.

29 नवंबर, 2012 के बाद तो जिंदगी ही गजल बन गई.

जो गाने सबसे ज्यादा बेचैन करते हैं वह दरअसल मेरे टेपरिकॉर्डर, डीवीडी, आई पॉड या मोबाइल में बजे गाने नहीं है. वे वे गाने हैं जो मैंने कॉलर ट्यून्स में सुने थे और सुना करते थे. टुकड़ों में बंटी जिंदगी में हर दौर में कुछ लोग आए-गए. कुछ लड़कियां भी आईं-गईं. वे कॉलर ट्यून्स आज भी मन में एक तरंग पैदा करते हैं. यह तरंग मन को झकझोरता है, रोकता है आगे बढ़ने से और जिद करता है पीछे चलने को. लेकिन क्या वे लोग वहीं होंगे और मेरे वापस लौटने पर मुझे मेरा इंतजार करते हुए मिलेंगे? हास्यास्पद है ये!

हनुमान चालीसा और अनुप जलोटा के भजन से लेकर “प्रेम की नैया है राम के भरोसे अपनी भी नैया को पार तू लगाई दे” तक में कई लोग गूंथे हुए हैं, कई यादें घुली हुई है और कई अधूरी कहानियां जस की तस बड़ी हैं, जिन्हें आगे लिखा ही नहीं जा सका.

शायद ही अब वो कहानियां कभी पूरी हों!





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