Monday, July 14, 2014

सात समंदर पार से



                                      कोई ताजा हवा चली है अभी...



न तो मैं रेखा रामास्वामी को जानता हूं न ही सोनम सिंह को. न मैं कभी मनुभाई सिंगापुरी से मिला हूं और न ही मेरा कोई इतना बड़ा कद है कि मेरे कहने पर कोई अप्रवासी भारतीय (एनआरआई) मुझे मिलने या बात करने का समय दे.

मैं स्तब्ध हूं कि क्या जो हुआ वो सच है! क्या सच में सात समंदर पार बैठी किसी महिला ने मेरे ट्विट को पढ़कर बिना किसी जांच-पड़ताल के मेरे दोस्त की सहेली को पचास हजार रुपये दे दिए

ये घटना चरणबद्ध तरीके से हुई जिसे समझने के लिए कुछ स्क्रीन शॉट से होकर गुजरना जरूरी है.

किरण तिवारी से दिल्ली में जनसत्ता कार्यालय में मुलाकात हुई थी और फिर हम दोनों फेसबुक पर एक दूसरे से जुड़े. वो अच्छा लिखती हैं और मेरी पसंदीदा उपन्यास "मुझे चांद चाहिए" उनकी भी पसंदीदा है. कल फेसबुक पर उनके एक स्टेटस को देखकर मैं पहले तो गुजर गया लेकिन फिर वापस आकर पूरा पढ़ा.

मुझे फेसबुक से शून्य उम्मीद रहती है यही कारण है कि मैंने फेसबुक पर किरण को अपना मेल आई डी दी और फिर फोन पर कहा कि वह तत्काल पांच मिनट के अंदर ट्विटर पर अकाउंट बना लें. जब तक किरण ट्विटर पर आईं तबतक मैंने योजनाबद्ध तरीके से ट्विट की एक श्रृंखला तैयार की और एक-एक करके पोस्ट करने लगा.

इसे twitter.com/yksheetal पर देखा जा सकता है.



थोड़ी देर के बाद प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गईं. इनमें से अधिकतर प्रतिक्रियाएं इसलिए आईं क्योंकि मेरे ट्विट को श्री अनिल कोहली ने रिट्विट (जिस तरह फेसबुक पर शेयर होता है) किया था. अनिल कोहली और मैं एक दूसरे को निजी तौर पर जानते हैं. वह और एस रघुनाथ मेरे लिए अभिभावक की तरह रहे हैं. 

किसी रेखा रामास्वामी ने मुझसे संपर्क किया. वह एनआरआई थीं और वह मुझसे मैसेज बॉक्स में संवाद करना चाहती थीं. चूंकि मैं उन्हें फोलो नहीं करता था इसलिए उन्हें मजबूरन मुझे ट्विट करके यह बात कहनी पड़ी.


मैंने उनको फोलो करना शुरू किया तो तुरंत उनका मैसेज आया जिसमें उम्मीद की किरण नहीं बल्कि पूरा प्रकाशपुंज था. मैंने तत्काल किरण तिवारी को इसकी सूचना जीमेल पर दी.


रेखा रामास्वामी के अलावा सिंगापुर से भी एक मैसेज प्राप्त हुआ. धीरे-धीरे कई लोग ट्विटर पर रिप्लाय करने लगे. यह पूरी प्रक्रिया करीब ढ़ाई-तीन घंटे चली.
इस बीच रेखा रामास्वामी सहित कुछ अन्य एनआरआई से मैं नेट से जुड़ गया और सोनम सिंह की वह पेंटिंग जिसे वह बेच कर आगे पढ़ना चाहती थी, को मेल के जरिए उनलोगों को भेजकर अपील करने लगा कि वह उस पेंटिंग को खरीद लें ताकि सोनम आगे पढ़ सके. मैं फिर दुहरा रहा हूं कि मैं सोनम सिंह को अबतक नहीं जानता हूं.


आज सुबह जब मैं तुलसी प्रजापति फर्जी इनकाउंटर मामले की सुनवाई को कवर करने के लिए मुंबई सत्र न्यायालय जा रहा था तभी करीब 11 बजे किरण तिवारी का फोन आया. उनकी आवाज में चमक थी. उन्होंने बताया कि उन्हें रेखा रामास्वामी का मेल आया है और उन्होंने सोनम को आगे की पढ़ाई के लिए शुभकामना देते हुए आश्वस्त किया है कि वह 50,000 रुपया भेज रही हैं.

उधर जज ने केस की सुनवाई 24 जुलाई तक टाली इधर मैं कोर्ट रूम से नीचे आकर सीधा अनिल कोहली सर को फोन लगा दिया. जब सर ने फोन लिया तो मेरे पास बोलने के लिए कुछ नहीं था और मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि मैं कहां से शुरू करूं.

अनिल कोहली सर हमेशा की तरह यह मानने को तैयार ही नहीं हुए कि उनके कारण सोनम की मदद की जा रही है. अगर वो रिट्विट नहीं करते तो मैं रेखा रामास्वामी तक कभी नहीं पहुंच पाता.

दूसरी ओर रेखा रामास्वामी भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि उसने इतना बड़ा काम किया है. 

और अंत में...

Weekly report of that week can be seen here!


 
दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में निर्मला सीतारमण, अनिल कोहली और मैं.



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