Monday, June 9, 2014

उस गली में...

                                        ढुन्नू के चाचा नहीं रहे!

सालों घर से दूर रहने पर संवेदना धीरे-धीरे शिथिल सी होने लगती है. घर और गली में बिताए स्वर्णिम दिनों की याद भी धीरे-धीरे ओझल होने लगती है. लगातार दूसरों के बीच रहते-रहते मन यह एहसास खोने लगता है कि उसका कहीं कोई अपना भी है!

गली के सबसे बुजुर्ग चाचा जी के निधन की खबर एसएमएस से जब मिली तब मैं किसी प्रेस कांफ्रेंस में था. पहले एसएमएस के थोड़े अंतराल पर दो और एसएमएस आए जिसमें इसकी पुष्टि हो गई कि गली के सबसे सधे हुए बुजुर्ग ने सबको अलविदा कह दिया है. हा...!


फोटो साभार : बड़का बौआ (व्हाट्सएप)
उनका जाना यूं तो मेरे लिए कोई व्यक्तिगत क्षति नहीं है लेकिन उनके जाने से मेरी गली को जो सामाजिक क्षति हुई है उसकी भरपाई कभी नहीं हो पाएगी. उम्र के अंतिम पड़ाव पर भी जिस तरह वह बखूबी हर जवाबदेही को निभाते दिखते थे वह कम से कम मुझे हमेशा प्रेरित करती रहेगी.

आखिरी बार उनसे पिछले साल फरवरी में मिला था. वो घर से निकले ही थे कहीं जाने के लिए और मैं गली को बाहर खड़ा होकर घर को देख रहा था. पैर छुआ तो झट से पहचान गये.

“अरे ढुन्नू कब अइल्हीं”
“कल ही आए रात को”

मुझे ढुन्नू बोलने वाले गली में वह अकेले बुजुर्ग थे. अच्छा लगता था. लगता था कोई है जो मुझे बहुत पहले से जानता है.

उन्होंने जबतक जिया भरपूर जिया. यहां तक कि 5 अप्रैल को जब उनका निधन हुआ उस वक्त भी वह चल रहे थे. ऐसी विदाई कम को ही नसीब होती है कि उसे मरने से पहले किसी को मोहताज न होना पड़े. वो जबतक रहे अपने दम और वेतन पर रहे और जब गये तब भी न तो किसी को अस्पताल का चक्कर लगवाया और न ही किसी का कर्जदार बनकर गये.

उनके सामने बड़े हुए गली के सभी लड़कों जिनमें मैं भी शामिल हूं, को यह कसक जरूर रहेगा कि उनलोगों की शादी में आशीर्वाद देने के लिए गली का सबसे बुजुर्ग आदमी उपस्थित नहीं रहेगा.

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