Saturday, April 12, 2014



                                                   डिंपल से आगे

बेगूसराय से मुंबई भाया दिल्ली के सफर में मिली अनगिनत महिलाओं के बारे में कभी-कभी सोचने लगता हूं. यूं तो सोचने के लिए चीजों की कमी नहीं है लेकिन मुलायम सिंह यादव के बयान के बाद अजीब सी बेचैनी घर कर गई है.

जब से राहुल गांधी ने "महिला सशक्तिकरण" को 2014 लोकसभा चुनाव के मुद्दों के केन्द्र में रखा तभी से लग रहा था कि "सेक्युलरवाद" की तरह महिलाओं पर भी खूब कीचड़ उछलेगा और आखिरकार जिसका डर था वही हुआ.

मुलायम सिंह यादव की प्रोब्लम शायद यह है कि उन्हें सारी लड़कियां या महिलाएं अपनी बहू डिंपल यादव की तरह ही नजर आती हैं. डिंपल यादव जहां हैं वहां मुलायम के राजनीतिक कद के कारण ही हैं. उन्हीं के कद के कारण जब उपचुनाव में डिंपल को कन्नौज से सपा द्वारा प्रत्याशी घोषित किया गया तो कांग्रेस और भाजपा सहित किसी भी पार्टी ने उनके खिलाफ कोई उम्मीदवार खड़े नहीं किये.

मुलायम सिंह की बहु डिंपल यादव
ऐसे में जब देश की पहली महिला आईपीएस किरण वेदी कहती हैं कि मुलायम के बयान का प्रतिरोध डिंपल यादव को करना चाहिए तो लगता है किरण वेदी कई सालों के विदेश यात्रा से अभी-अभी लौट कर आईं हैं.

पिछली बार जब 20 मार्च को दिल्ली-मुंबई राजधानी से मुंबई लौट रहा था तो आरएसी में एक महिला के साथ सीट साझा करना था. बात चली तो चलने लगी. उनके समसामयिक ज्ञान ने स्तब्ध कर दिया. सुबह मुंबई सेन्ट्रल पहुंचकर जब हमने साथ में कॉफी पी तब पता चला कि उनके पति का देहांत काफी पहले हो गया है और अनुकंपा की नौकरी ठुकराकर उन्होंने अपना बिजनेस शुरू किया था.

मुंबई में फिल्म अभिनेत्री नंदा की पूरी जिंदगी ही एक मिसाल है. नंदा ने यह साबित किया कि कैसे कोई लड़की अपने शर्त पर जिंदगी जी सकती है. नंदा की जिससे शादी होने वाली थी उसकी आकस्मिक मौत हो गई लेकिन नंदा बढ़ती रही और बिना किसी जीवनसाथी के ही उसने मरने से पहले एक लंबी लकीर खींच दी.

मुंबई शक्ति मिल सामूहिक दुष्कर्म मामले को कवर करने वाले पत्रकारों को ज्यादातर लड़कियां थीं. प्रिंसिपल सेशन जज भी संयोग से महिला ही थी.

रेप पर फांसी हो या न हो यह कानूनी बहस का विषय है लेकिन मुलायम सिंह यादव को कम से कम बोलने से पहले यह समझ लेना चाहिए कि डिंपल यादव के अलावे और भी कई तरह की महिलाएं हमारे देश में हैं.

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