Friday, March 28, 2014

जाति जाती नहीं


                                                शीतल के बाद क्या!


जाति जानने के लिए नया तरीका ढ़ूंढा जाना चाहिए. क्यूंकि नए तरह के कई उपनाम आने के बाद पुराने लोगों को जाति जानने में बड़ी कठिनाई होती है और उनकी यह असहजता सामने वाले को भी असहज बना देती है.

पिछले दिनों एक स्कूली छात्रा से साक्षात्कार करने को गया. छात्रा के अंदर अभिव्यक्ति की तड़प थी और उसने उसे शब्दों में ढालकर एक कविता गढा था. उस कविता को कई ने सराहा तो उसका मनोबल भी बढ़ा. बढ़े मनोबल से वह कैमरे के सामने आई. साक्षात्कार हुआ और हम चलने को हुए कि उसकी पढ़ी-लिखी सी दिखने वाली मां ने फिर से नाम पूछ लिया!

दुनियादारी करते-करते अब इतना तो सयाना हो ही गया हूं कि अगर कोई तीन बार पूरा नाम पूछे तो उसका मतलब समझ सकूं.

"शीतल..हां आगे...शीतल के बाद!"
उनके चेहरे से उनकी असहजता साफ झलक रही थी.

"मेम मेरा नाम शीतल के बाद खत्म हो जाता है."
मैंने यह जवाब उनसे आंख मिलाकर दिया यह सोचकर कि वह समझ जाएंगी लेकिन जब उन्होंने बेचैनी छिपाते हुए फिर से वही सवाल किया तो मैं खुद से उलझ गया.

खुद से उलझने के बाद धैर्य कहां साथ देता है सो मैंने बिना कुछ परवाह किये कह दिया कि "आई डाेंट विलिव इन कास्ट, क्रीड, रिलीजन एंड सच फिल्दी थिंग्स"

इसके बाद उन्होंने क्या कहा यह मैंने ठीक से सुना ही नहीं क्यूंकि मैंने उसे सुनना चाहा ही नहीं. हो सकता है उन्होंने अपने बचाव में कुछ कहा होगा लेकिन मुझे वो सुनना ही नहीं था.

इस छोटी सी घटना ने मेरी उस अवधारणा को ही मजबूत किया कि पढ़े-लिखे लोग और मूर्ख लोगों में समझ को लेकर कोई खास अंतर नहीं होता है.


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