Wednesday, March 26, 2014

दुनिया मेरे आगे


                                             अलविदा नंदा                                                  


जब नंदा को विद्युत शवदाह गृह में ले जाया जा रहा था तो मैं हाथ में चैनल का लोगो और तार लपेटे हुए वहीं खड़ा था. बीच-बीच में विकीपीडिया के पन्नों और इधर-उधर छपी ताजा खबरों के प्रिंट आउट को थोड़ी-थोड़ी देर में पढ़ता जा रहा था ताकि लाइव देने की स्थिति आए तो एंकर के सवालों का जवाब दे सकूं.

तबस्सुम ओशिवाड़ा श्मशान भूमि पहुंचने वाली अकेली अभिनेत्री थीं. चूंकि मैंने उम्मीद लगा रखी थी कि नंदा को आखिरी बार विदा करने के लिए वहां सभी बड़े-छोटे कलाकारों की भीड़ होगी इसलिए वहां किसी के नहीं आने पर मुझे थोड़ा ताज्जुब हुआ. वैसे भी महीने भर में मुंबई को समझ लिया तो फिर मुंबई मायानगरी काहे की!

तबस्सुम ने मीडिया को बताया कि वह और नंदा बचपन की सहेलियां थी और साथ में उन्होंने हर तरह के दिन देखे. पत्रकारों से बात करते हुए तबस्सुम अचानक भावुक हो गईं और बताया कि नंदा के हाथों में कभी मेंहदी नहीं लग सकी. तबस्सुम ने इस बात को जिस अंदाज में कहा उससे मेरे ठीक पास में खड़ी जी न्यूज की महिला रिपोर्टर की आंखें भींगा दी.



एक और बात जो तबस्सुम ने बताया वह था कि नंदा की आखिरी ख्वाहिश थी कि उसे मरते दम तक किसी का मोहताज न रहना पड़े और शायद सुनने वाले ने उसकी सुन ली और वह खाना बनाते-बनाते गिरी और मर गई. न अस्पताल में उसे किसी के खून की जरूरत पड़ी और न किसी के सहानुभूति की!

पता नहीं क्यूं मुझे नंदा में एक अजीब सी जिद दिखती है. एक ऐसी जिद जो मुझे महानगर में घिसने वाले कई युवाओं और युवतियों में अक्सर दिख जाती है. यह जिद है खुद में सिमट कर रहते हुए सबकुछ कर गुजरने की. लोग अब पहले से कम बोलते हैं. दिल्ली में मेट्रो की सीढ़ियां और मुंबई में लोकल की सीट पर नई पीढ़ी कान में इयरफोन लगाकर कुछ सुनती है, कोई धुन, कोई गाना, गजल, कौवाली, भजन या कुछ भी. फिर यह पीढ़ी उठकर चल देती है और दौड़ते हुए दूसरी बस या लोकल पकड़ती है. आपस में बैठते हुए भी ये पीढ़ी मोबाइल, टेब या किसी तकनीक के सहारे संवाद करते हैं. बोलते नहीं हैं!

हर कोई मिसाइल की तरह कहीं से रोज लॉन्च होता है और रोज कहीं जाकर गिरता है. रोज अनगिनत चुनौतियां उससे बिना किसी प्री-अप्वाइंटमेंट के घेरती हैं और धीरे-धीरे वह कठोर होता जाता है. नंदा के साथ भी शायद यही हुआ होगा. जिस मनमोहन देसाई के साथ उसकी शादी होनी थी उसकी आकस्मिक मौत को शायद नंदा ने जिंदगी की एक चुनौती मानी होगी और तभी पूरी जिंदगी शादी न करने का फैसला लिया होगा!

वैसे भी शादी कहां प्रासंगिक रह जाती है जब आप खुद के अंदर ही एक जीवनसाथी पैदा कर लेते हैं!

धुएं में नंदा 

बचपन की सखी तबस्सुम


खैर नंदा की सबसे ज्यादा याद मुझे तब आएगी जब मैं पटना-सिल्लीगुड़ी वाली बस पर अगली बार रात का सफर करूंगा और कंडक्टर बस के अंदर की सारी बत्तियां बुझाकर "ये समां समां है ये प्यार का..." गाना चलाएगा. हो सकता है मैं रो भी लूं लेकिन इस बात का आत्मबल है कि उस दिन भी मैं उस महिला पत्रकार की तरह न रोकर अंदर ही अंदर रोउंगा क्यूंकि नंदा के आंसू कभी किसी ने नहीं देखे बस उसकी हंसी देखी.


                "मैं तो हूं सपनों के राजा की रानी, सच हो न जाए ये झूठी कहानी"


                                                                                                                 अलविदा नंदा!

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