Monday, June 3, 2013

AMWAY

                          

                    एम-वे की कुंडली

दो साल पहले केरल के एक न्यायालय में दर्ज मुकदमे में अमेरिकी कंपनी एमवे के भारत संस्करण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सहित दो अन्य निदेशकों को जेल जाना पड़ा है. भारतीय उद्योग जगत ने इस पूरे मामले पर भयमिश्रित त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए सप्तम सुर में मामले की पुरजोर निंदा की है. फिक्की ने जहां कहा है कि मामले को उपभोक्ता अदालत में निबटाना चाहिए था वहीं एम-वे के शीर्ष अधिकारी अब स्विस दवा कंपनी नोवार्टिस की तरह ही भारत को विदेशी निवेशकों के रूठ जाने का डर दिखा रहे हैं. भारतीय राज्य केरल को आर्थिक गतिविधियों का शोध स्थल माना जाता है. इस्लामिक बैंक और अन्य आर्थिक बनावट पर आधारित बिजनेस पर शोध यहां होता आया है.

प्राइज चिट्स एंड मनी सर्कुलेशन स्कीम एक्ट के उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार होकर जमानत पर रिहा हुए एम-वे के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सह प्रबंध निदेशक विलियम एस पिंकनी ने अब तक कोई अप्रत्याशित बयान नहीं दिया है. हालांकि 2011 में जब केरल पुलिस ने राज्य में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए एम-वे स्टोर्स को सील करना शुरू किया था तब पिंकनी ने कहा था कि राज्य पुलिस कंपनी से जुड़े नीचले स्तर के लोगों को कंपनी के खिलाफ शिकायत दर्ज करने का दबाव बना रही है. य़हां यह बताना भी जरूरी है कि 2006 में ही आंध्रप्रदेश में कंपनी की कार्यप्रणाली को लेकर हंगामा मचा था और कंपनी सुर्खियों में आ गई थी. प्रवर्तन विभाग ने तब कंपनी के बिजनेस माडल को गैर कानूनी बतलाया था और ताबड़तोड़ छापेमारी की थी. यहां तक कि भारतीय रिजर्व बैंक ने भी कंपनी की गतिविधियों को लेकर स्थानीय पुलिस को चेताया था. 

इस सब के बाद कंपनी ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जहां से उसे थोड़ी राहत मिली जब कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया मामला किसी कानून के उल्लंघन का नहीं लगता है. इसके बाद 14 अगस्त, 2007 को सर्वोच्च न्यायालय ने आंध्रप्रदेश पुलिस को  पूरे मामले की जांच छह महीने में खत्म करने को कहा. इसके बाद राज्य उच्च न्यायालय के आदेश का जिक्र करते हुए प्रदेश सरकार ने कंपनी द्वारा मीडिया में दिए जाने वाले विज्ञापन पर रोक लगा दी.

एम-वे सिर्फ भारतीय एजेंसियों के रडार पर ही आया है ऐसा नहीं है, अमेरिका, ब्रिटेन सहित अन्य देशों की भी एजेंसियां एम-वे को लेकर सक्रिय रहीं हैं और कई बार कंपनी को जुर्माना भरना पड़ा है. 1979 में फेडरल ट्रेड कमीशन ने कंपनी की य़ोजनाओं पर सवाल उठाए थे. इन सबके बीज दिलचस्प यह भी है कि अमेरिकी चुनावों में प्रत्याशियों पर रूपये झोंकने में यह कंपनी शीर्ष पर है. 1990 में कंपनी ने अमेरिकी चुनाव में करोड़ों डालर फूंक दिए. 1994 में कंपनी ने 2.5 मिलियन डालर का चुनाव में निवेश किया, जो उस समय का सर्वाधिक निवेश था.

एम-वे के मालिक स्टीव वेन अंदेल ने 2009 में कहा था कि आने वाले पांच सालों में वह भारत को कंपनी के शीर्ष पांज बाजारों में देखते हैं. उनके सपने के चार साल के बाद ही कंपनी अब भारत में सर के बल खड़ी होती दिख रही है. कंपनी के जिन तीन शीर्ष अधिकारियों को केरल पुलिस ने दबोचा है उनमें कंपनी के भारत संस्करण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विलियम एस पिंकनी और दो अन्य निदेशक अंशु बुध्रजा और संजय मल्होत्रा शामिल हैं. केरल के आर्थिक अपराध शाखा के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि उन्हें कंपनी से जुड़ी कई शिकायतें मिली हैं. 

गौरतलब है कि 2012 में भी अधिकारियों ने कहा था कि कंपनी के काम करने का तरीका गैर कानूनी है और कंपनी मासूम लोगों के विश्वास की कीमत पर काम कर रही है. वहीं कंपनी की वेबसाइट इन सब आरोपों का जोरदार खंडन करती है और दावा करती है कि उसने भारी संख्यां में भारत में रोजगार के अवसर पैदा किए हैं, जिनमें महिलाओं का अनुपात भी उल्लेखनीय है. चूंकि यह बिजनेस माडल ऐसा है जिसमें घर से सदस्यों को भी बतौर ग्राहक बनाया जा सकता है इसलिए इसे रिलेशनशिप मार्केटिंग भी कहते हैं.

दिलचस्प बात यह भी है कि कंपनी अपनी श्रृंखला बढ़ाने के लिए लोगों को कई तरीके से प्रभावित करती है. मसलन कंपनी बाइबिल की पंक्तियों से भरे हुए सीडी कैसेट का इस्तेमाल करती है. इसका लोगों पर सीधा असर होता है. इसके अलावे स्थानीय स्तर पर कंपनी ऐसी ही कई तकनीकों का सहारा लेती है.

डायरेक्ट सेलिंग एसोसिएशन नामक एक लाबिंग ग्रुप की रिपोर्ट के अनुसार 1990 में पच्चीस फीसदी लोग मल्टी लेवल मार्केटिंग से जुड़े हुए थे, जो कि 1999 में 77.3 फीसदी हो गया. एवन, इलेक्ट्रोलक्स, टपरवेयर, किरवी जैसी कंपनियां जो कि सिंगल लेवल मार्केटिंग में थी, इन्होंने बाद में मल्टी लेवल मार्केटिंग का रास्ता चुन लिया. 2009 तक सदस्यों का आंकड़ा 94.2 फीसदी पहुंच गया. डीएसए के करीब दो सौ सदस्य हैं. एक अनुमान के मुताबिक अमेरिका में एक हजार फर्म मल्टी लेवल मार्केटिंग का काम कर रहे हैं.

पिरामिड आधारित यह माडल कई तरह से घातक है. अमेरिकी फेडरल ट्रेड कमीशन के अनुसार नए डिस्ट्रीब्यूटर्स न बन पाने की स्थिति में पूरा ढ़ाचा ध्वस्त होना तय है और इसमें शीर्ष पर बैठे लोगों को छोड़ दें तो भारी संख्यां में श्रृंखला से जुड़े लोगों का बर्बाद होने का खतरा बना रहता है. इसके अलावे ऐसी कंपनियां उत्पात की कीमतें तय करके भी आयकर विभाग को चुना लगाती हैं.

मार्केट संतृप्ति: एक अंतर्निहित समस्या

कोई भी कंपनी मांग और आपूर्ति के सिद्धांत पर चलती है. पिरामिड माडल में मांग पैदा करने की कोई तकनीक नहीं है. मांग न होने की स्थिति में कंपनी का डूबना तय रहता है. कई बार छद्म मांग के जरिए कंपनी का चलाया जाता है लेकिन लंबे समय के लिए यह संभव नहीं है. व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो मांग और आपूर्ति के बिगड़े समीकरण के कारण ही सोवियत अर्थव्यवस्था ध्वस्त हुई थी. इस तरह से देखने पर मल्टी लेवल मार्केटिंग और भी खतरनाक दिखता है. मसलन इसमें मांग और आपूर्ति पर नजर रखने वाली कोई इकाई नहीं होती है. य़ह एक बिना ब्रेक की रेल की तरह है. जिसमें बाजार की संतृप्ति को नजरअंदाज कर दिया गया है. बाजार में विविधता को लेकर मांग के ग्राफ में असंतुलन बने रहना भी तय है. मसलन मान लिजिए कि ए नामक कोई कंपनी सौ रूपये में एक कलम बेच रही है. इसकी प्रबल संभावना है कि उपभोक्ताओं का एक वर्ग ऐसा होगा जो गुणवत्ता से समझौता करके नब्बे रूपये वाला कलम ही खरीदेगा. ठीक इसके विपरीत कोई वर्ग ऐसा भी होगा जो एक सौ बीस रूपये की कलम उपयोग में लाता हो. लेकिन कंपनी फिक्स प्राइस के सिद्धांत पर सौ रूपये का ही कलम उपलब्ध करवा रही है. ऐसे में मांग के न्यून होने का खतरा बना है. ऐसे में उनका क्या होगा जिनकी नियुक्ति उस उत्पाद को बेचने के लिए की गई है. य़ह कहना गलत नहीं होगा कि यह एक हीलियम बैलून जैसा ही है, जिसमें हीलियम के रूप में उत्पाद की मांग भरी होती है.

इन सब के बीच एक बड़ा सवाल यह भी है कि अगर मल्टी लेवल मार्केटिंग में बेचे जाने वाले उत्पाद उम्दा हैं तो क्यूं नहीं इसे पारंपरिक बाजार के माध्यम से बेचा जाता है? आखिर इसके लिए विशेष मार्केटिंग की जरूरत ही क्यूं है? इसे बेचने के लिए विशेष प्रशिक्षण की जरूरत क्यूं है? मांग निश्चित और सीमित होने की स्थिति में बाजार के हाल का अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है. मल्टी लेवल मार्केटिंग में कोई नियंत्रक तकनीक काम नहीं करती है. मसलन किसी कंपनी में कर्मचारियों की बहाली एक सीमा के बाद रोक दी जाती है, जबकि मल्टी लेवल मार्केटिंग में ऐसा नहीं है. इसकी श्रृंखला चलती रहती है. बहाली तभी रूकती है जब कंपनी का पर्दाफाश हो जाता है या फिर मांग ठप हो जाती है.

दरअसल मल्टी लेवल मार्केटिंग पूरी तरह से ज्यामितिय तरीके से संचालित होता है. मसलन एक आदमी ने सपने बेच कर दस लोगों को जोड़ और फिर उन दस लोगों ने दस लोगों को जोड़. इस तरह से एक समय के बाद दस हजार लोग उस उत्पाद को लेकर बाजार में तैनात हो जाएंगे. लेकिन इसे खरीदेगा कौन और मांग का क्या होगा? य़ह एक तरह से सपनों को बेचने वाला व्यवसाय है. कंपनी का तर्क है कि इस श्रृंखला में चूंकि सभी सफल नहीं होंगे इसलिए बाजार में मांग बरकरार रहेगी. तो क्या कंपनी असफल लोगों की कीमत पर व्यवसाय कर रही है? इसका सीधा मतलब यह है कि कंपनी की सफलता, उसके एजेंटों की असफलता में ही निहित है. कंपनी हर किसी को यही कहती है कि वह सफल होगा. इसके लिए कंपनी बाइबिल की पंक्तियों का उपयोग करती है, जैसा कि लेख में पहले भी बताया जा चुका है.

हालांकि कोई भी धर्म लालची होने की सीख नहीं देता है लेकिन यह अपने आप में एक मजेदार बात है कि बाइबिल की चर्चा करते हुए बिजनेस चलाने वाला एम-वे लोगों से लालची होने की अपील करता है. किसी भी मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनी के पंपलेट को आप गौर से पढ़ें तो सार यही है. कंपनी का फोकस बाजार पर कम और लोगों की कृत्रिम प्यास बढ़ाने पर ज्यादा होता है, जो कि बिजनेस एथिक्स के खिलाफ है.

1991 में एक दिलचस्प वाक्या हुआ. एमएलएम फंड अमेरिका नामक एक मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनी में कई ऐसे एजेंट निकले जो कई श्रृंखला में शामिल थे. जैसे मान लीजिए किसी मोहन नामक युवक से किसी राम नामक एजेंट के झांसे में आकर उससे जुड़ गया, फिर वही मोहन बाद में रहीम से भी जुड़ गया. कंपनियों में ऐसी गतिविधियों पर लगाम कसने के लिए कोई तकनीक तो नहीं ही है साथ ही कंपनी की बनावट इतनी अपारदर्शी है कि इसमें ऐसी गतिविधियों के होने की पूरी संभावना बनी रहती है. एमएलएम फंड अमेरिका को बाद में बंद कर दिया गया और इसके कई अधिकारियों का जेल जाना पड़ा. बाद में कंपनी के बारे में कई अन्य तरह की जानकारियां भी सार्वजनिक हुई, जिसमें पता चला कि कंपनी अपने उत्पाद को बेचने के लिए कई तरह के संवेदनशील अफवाहों का सहारा भी लेती थी. कंपनी द्वारा अपने उत्पाद बेचने के लिए कुछ बड़े शख्सियत के नामों का गलत तरीके से इस्तेमाल करने की बात भी सामने आई थी. पिरामिड योजनाओं को इसलिए गैर कानूनी करार दिया गया है क्यूंकि यह शोषण आधारित और घोर अपारदर्शी है.

सामाजिक रिश्तों को पूरी तरह बाजारी बनाकर नफा नुकसान से जोड़ देने वाली जो कला मल्टी लेवल मार्केटिंग में है वह और कहीं नहीं है. व्यावहारिक तौर पर देखें तो श्रृंखला बनाने की होड़ में लोग सबसे पहले अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को जोड़ते हैं. कंपनी में उत्पाद बेचने का दबाव इतना अधिक होता है कि आपस में खरीद बिक्री भी होती है. इस तरह धीरे धीरे रिश्तों की मधुरता, नफा नुकसान के गणित में कमजोर पड़ती जाती है और फिर खत्म हो जाती है और यही बाजारवाद की सबसे बड़ी देन है!

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