Monday, April 29, 2013

Interview

                      इंटरनेट पर सूचनाओं को कोई खतरा नहीं है


गूगल के कार्यकारी अध्यक्ष एरिक और कंपनी के योजना निदेशक जेयर्ड कोहेन ने मिंट को दिए साक्षात्कार में कहा है कि इंटरनेट उन खोजों में से है, जिसे खोजकर्ता भी नहीं समझते हैं. 23 अप्रैल को जारी हुई इनकी किताब “द न्यू डिजीटल एज” में इसकी विस्तार से चर्चा की गई है कि किस तरह दुनिया के सबसे बड़े गैरसरकारी मंच को विभिन्न सरकारों द्वारा निशाना बनाया जा रहा है.

इस किताब में उस घटना का भी जिक्र है जब 2009 में पहली बार एरिक और जेयर्ड बगदाद में मिले थे. यहां इन्होंने यह महसूस किया कि खाना, पानी और तमाम बुनियादी जरूरतों की घोर किल्लत के बावजूद, यहां मोबाइल की बिक्री तेजी से बढ रही है. इसके बाद उन्होने इंटरनेट तकनीक को दुनिया भर में फैलाने का फैसला किया.

उसके बाद दोनों ने दुनिया का भ्रमण किया और इंटरनेट के भविष्य की संभावना तलाशनी शुरू की. न्यू यार्क से फोन पर दिए साक्षात्कार में एरिक और जेयर्ड ने चीन और सीरिया सहित अन्य देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि किस तरह सरकारों द्वारा इंटरनेट पर लगाम कसने की कोशिश की जा रही है. साथ ही उन्होंने कहा कि किस तरह सरकारों के लिए आभासी दुनिया, वास्तविक दुनिया से ज्यादा चुनौती खड़ी कर रही है. इसके अलावे भविष्य में होने वाले संभावित साइबर वार के बारे एरिक और जेयर्ड ने चर्चा की है. 


पेश है साक्षात्कार के अंश...


आप दोनों ने ही अलग अलग सरकारों द्वारा इंटरनेट के वैश्विक प्रवाह में अवरोध पैदा करने की बात कही है. साथ ही आपने अंदेशा जताया है कि जिस तरह दूसरे देश जाने के लिए वीजा की जरूरत होती है संचार के इस प्रवाह को भी वीजा की जरूरत हो सकती है!

एरिक- बिल्कुल ठीक. आज दुनिया का हर कंप्यूटर एक दूसरे से इंटरनेट के माध्यम से जुड़ा है, यह एक तरह की चेतावनी है. चीन आज भारी संख्या में ऐसी तकनीक अन्य देशों को निर्यात कर रहा है, जिससे इंटरनेट पर कारगर तरीके से सेंसरशिप लगाई जा सकती है. सीरिया में इंटरनेट पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है. किसी न किसी बहाने से सभी सरकारें इंटरनेट को अपने नियंत्रण में रखना चाह रही है.

कोहेन-  इसका एक वैश्विक पहलू है. एरिक जैसा कह रहे हैं अगर वैसा होता है तो आप आसानी से उस स्थिति की कल्पना कर सकते हैं, जब एक विचारधारा या धर्म मानने वाले देश आपस में संगठित होकर तानाशाही तरीके से इस्लामिक वेब और औटोक्रेटिक साइबर यूनियन जैसे संगठन बनाएंगे. विश्व की 57 प्रतिशत आबादी तानाशाही में जीती है, और वहां अब भी तकनीक उपलब्ध नहीं है. अगर यहां के लोग इंटरनेट से जुड़ना चाहते हैं तो यह उनकी सरकार पर निर्भर है कि वह इन्हें बंद रखे या सूचना के प्रवाह के बीच इन्हें बहने दे. इस तरह के उदाहरण से आखिरकार यही निष्कर्ष निकलता है कि इंटरनेट का क्षेत्रीकरण कितना आसान है.


ऐसा लगता है कि साइबर स्पेस को बांटा जा रहा है और इस पर शिकंजा कसा जा रहा है.
एरिक- अगर ये सही है, जिसके न होने की मैं प्रार्थना करता हूं, तो ये अत्यंत अफसोसजनक है, क्योंकि इंटरनेट के खुले प्रवाह ने विश्व समाज को कई तरह से लाभान्वित किया है, मसलन सीधा संवाद, विचारों का सीधा आदान प्रदान आदि. जो सरकारें इंटरनेट पर लगाम कस रही है, वह समाज को पीछे धकेल रही है.

कोहेन- इंटरनेट के क्षेत्रीकरण को लेकर हम चिंतित हैं. सकारात्मक होना आसान है लेकिन सिर्फ सकारात्मक रहना गैर जवाबदेही है. इंटरनेट का क्षेत्रीकरण एक विकट समस्या है और हम चाहते हैं कि हर कोई इसे एक चुनौती की तरह ले और इसका विरोध करे. सरकार के लिए अपने नागरिकों को बताए बिना ऐसा करना काफी आसान है.

इंटरनेट यूजर्स के लिए न्यू डिजिटल एज का क्या मतलब है? क्या इस मामले पर विकसित और विकाशसील देशों में कोई अंतर है?
कोहेन- कम्प्यूटर आज की जरूरत बन गई है, लेकिन हमें तकनीक की दुनिया को सभी समस्याओं का रामबाण इलाज नहीं समझना चाहिए. लेकिन इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता है कि कई समस्याओं को सुलझाने में तकनीक की निर्णायक भूमिका है. इंटरनेट ने किसी भी देश का नुकसान नहीं किया है. तानाशाह और अस्थिर देशों से भी करीब पचास लाख लोग इंटरनेट से जुड़े.

एरिक- यकीनन तौर पर विकसित देशों में इंटरनेट से जुड़ने की अत्याधुनिक तकनीक है, जबकि विकासशील देश अपने बैंडबिथ और माध्यमों को बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं. विकासशील देशों में लोग इंटरनेट से जुड़ने के लिए मोबाइल को माध्यम बनाएंगे.

कोहेन- केन्या, नाइजीरिया और एशिया के कुछ देशों में जाने के बाद हमें ऐसा लगा कि आने वाले समय में विकसित देश और विकासशील देशों के बीच एक दिलचस्प पार्टनरशिप काम करेगी. एक ओर जहां अमेरिका व अन्य विकसित देश नई तकनीक का निर्माण करेंगे वहीं विकासशील देश इन तकनीकों में नवपरिवर्तन लाकर इसे विकसित देशों को निर्यात करेंगे. हमने ऐसा महसूस किया कि विकासशील देश कम से कम संसाधनों में भी बेहतर प्रदर्शन करते हैं.

अपनी किताब में आपने कहा है कि इंटरनेट की आभासी दुनिया, वास्तविक दुनिया को पीछे छोड़ देगी और इसे और ज्यादा जटिल बना देगी.
एरिक- अलग अलग उद्देश्यों के लिए कोई व्यक्ति अलग अलग अकाउंट बना सकता है, ये वैसा ही है जैसे आफिस और घर के लिए अलग अलग फोन नम्बर रखे जाते हैं. हालांकि कई देशों में फर्जी अकाउंट बस मजा करने के लिए बनाया जाता है, लेकिन इसके विपरीत इंटरनेट पर सख्त पहरा रखने वाले देशों में खुद को सुरक्षित रखने के लिए लोग फर्जी अकाउंट बनाते हैं.

कोहेन- तानाशाहों को होने वाली परेशानी का हम मजा लेंगे. आने वाले समय में गलत पहचान से अकाउंट चलाने वालों की संख्या काफी होगी. सरकारों को ऐसे लोगों तक पहुंचने के लिए काफी मशक्कत करनी होगी. अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाली संस्थाओं के लिए यह फायदेमंद होगा.

आपने कहा है कि इस तरह की आभासी पहचान के सहारे काले धन के एक नए आनलाइन बाजार का जन्म हो सकता है.

एरिक- हमने फर्जी अकाउंट की ताकत का आकलन किया है. अगर आप किसी समस्या से जूझ रहे हैं तो ये अकाउंट आपके लिए मददगार साबित हो सकता है. यह एक तरह से फर्जी पासपोर्ट की तरह है.

कोहेन- पिछले साल जब हम पाकिस्तान के दौरे पर थे, तब हमें महिलाओं का ऐसा समूह मिला, जिनपर तेजाब से हमला हुआ था. समाज में इनपर कई तरह के लांछन लगाए गए और इनका जीना मुहाल कर दिया गया. अब ये महिलाएं एक घर में साथ साथ रहती हैं और अपनी सही पहचान छिपाकर आनलाइन बिजनेस कर रही हैं. इस तरह हम देखते हैं कि तकनीक कई लोगों को पुनर्जीवन दे रहा है.

आपने जुलियन असांजे और विकिलिक्स के पहलू का भी जिक्र भी किया है. साथ ही एकतरफा संवाद और योजनाबद्ध तरीके से सूचनाओं को प्रवाहित करने जैसी जटिल समस्याओं की भी चर्चा की है.

एरिक- दो साल पहले जुलियन असांजे से हमने बात की थी. हमने सूचना को लेकर उनके नजरिये पर बात की. असांजे ने कहा कि अगर कोई सरकार जनता के हितों को ताक पर रखकर कोई काम करने जा रही है तो वो इसका ब्यौरा कहीं न कहीं जरूर लिखेगी. और अगर ये सूचना लोगों तक पहुंच गई तो उसपर ऐसा न करने का जनता का भारी दबाव आएगा. मैं असांजे के तर्क से काफी प्रभावित हुआ लेकिन समस्या ये है कि ये कौन तय करेगा कि कौन सी सूचना लीक करनी है. असांजे का जवाब था कि सूचना लीक करने वाला ही यह तय करेगा. मैंने अपनी किताब में इसका जिक्र किया है.

कोहेन- असांजे के बारे में काफी कुछ लिखा गया है और लिखने वाले अलग अलग निष्कर्षों पर पहुंचे हैं. चूंकि असांजे की तकनीकी पृष्ठभूमि है और उन्हें इस क्षेत्र में महारत हासिल है, हमने उनसे दस साल बाद की स्थिति जाननी चाही. उनसे बातचीत के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आने वाले समय में कई विकिलिक्स होंगे. लेकिन हमें यह समझना होगा कि ऐसी संस्थाओं की विश्वसनीयता संवेदनशील होने के कारण इनकी सफलता पर प्रश्नचिह्न लगा रहेगा.

आपने अपने किताब में जिक्र किया है कि सोशल मीडिया पर छोटे समूह, सरकार और बड़े समूहों की तुलना में ज्यादा चुनौतीपूर्ण है.

कोहेन- बिल्कुल. संभव है कि मैं सोशल मीडिया के जरिए मैं खुद को लाखों लोगों का प्रतिनिधि साबित कर दूं. ऐसा करके मैं सरकार के लिए चुनौती खड़ी कर सकता हूं. सरकार के लिये ऐसी परिस्थिति से निबटना आसान नहीं होगा और वह इस तरह के विरोध को अवैध भी ठहरा सकती है. इस तरह सरकार अपने आलोचकों को भी कुचल सकती है. ऐसे में जायज मांग करने वाले कार्यकर्ताओं को भारी नुकसान होगा. दूसरी तरफ अभियान चलाने वालों की संख्या को लेकर भ्रम की स्थिति बनने के कारण सरकारें कई बार प्रतिक्रिया देने से बचेगी. हमने किताब में इस तरह की प्रतिस्पर्धा के बाजारू पहलू का भी जिक्र किया है. यहां मैं सीरिया का उदाहरण देना चाहूंगा. वहां के राष्ट्रपति बशर अल असद के इस्तीफे की मांग कई संगठनों ने फेसबुक पर उठाई. दुनिया इन समूहों के बारे में बहुत कम जानती है और उन्हें ऐसे समूहों के आय श्रोतों के बारे में जानकारी नहीं. ऐसे संगठनों को सहानुभूति हाथों हाथ मिलती है. बाजारी प्रतिस्पर्धा के लिए भी ऐसे समूह का उपयोग किया जाएगा. लेकिन वास्तव में इन समूहों का लक्ष्य अलकायदा जैसे संगठनों से मिलता जुलता हो सकता है.


नई दुनिया में आप साइबर वार को किस तरह देखते हैं?

कोहेन- आने वाला समय साइबर वार का होगा. जमीन पर आक्रामक न दिखने वाले देश साइबर पर आक्रामक दिखेंगे. उदाहरण के लिए अमेरिका और चीन में मजबूत व्यापारिक संबंध हैं साथ ही वे आर्थिक साझेदार भी हैं. लेकिन साइबर पर वे एक दूसरे के शत्रु से भी बढकर हैं. वास्तविक दुनिया में जहां परमाणु हमले की धमकी दिया जाना चरम माना जाता है वहीं बेहद दिलचस्प है कि इरान की परमाणु योजनाओं को लेकर साइबर हमले पर कोई खास चर्चा नहीं हुई.

आपने डाटा स्थानांतरण व उससे जुड़े प्रभावों का भी जिक्र किया है.

एरिक- मान लीजिए कि अमेरिका का कोई आदमी जज से कहता है कि वह उसके उस अपराधों का ब्योरा नष्ट कर दे जो उसने बचपन में किया था. लेकिन यह किसी के बस में नहीं होगा. इंटरनेट पर सूचनाओं की हत्या नहीं की जा सकती.


For reading this interview in English, please click here- INTERVIEW

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