Tuesday, January 15, 2013

POEM

ऑटो में ऑफिस आने के दौरान मेरी खास दोस्तों में एक स्नेहा ने ये कविता "शहर" पर लिखी है। स्नेहा की अनुमति से इसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है। स्नेहा लम्बे समय से आरटीआई और अन्य सामाजिक कार्यों से जुड़ी रही हैं।
शहर 

कैसी ये ज़मीन ?
मिट्टी की खुशबू  नहीं 

कैसा आसमां ?
तारे भी नहीं दिखते ..

हाँ माना आजादी है यहाँ ज्यादा 
कोई नहीं रोकने टोकने वाला 
हो जाये कुछ तो सोचने वाला 

आज़ादी है ज्यादा पर न जाने क्यों ..
पंछी यहाँ नहीं टिकते 

कैसी ये ज़मीन ?
मिट्टी की खुशबू  नहीं 

कैसा आसमां ?
तारे भी नहीं दिखते ..

हाँ माना सहुलीयतें हैं बहुत .. 
नीयत नहीं पर उतनी 
इंसानीयत भी नहीं ..

सहूलीयतों के बावजूद ज़रूरतें क्यूँ नहीं थमती?
रोज़ खरीदते बिकते ..

कैसी ये ज़मीन ?
मिट्टी की खुशबू  नहीं 

कैसा आसमां ?
तारे भी नहीं दिखते ..

                                            
                                                                          स्नेहा कोठावाडे, नई दिल्ली 
                                                        contact.snehakothawade@gmail.com

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