Tuesday, January 8, 2013

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                                               फिल्मों से सीख


       धड़कन फिल्म में अंजलि ने "मैं सात जन्मों के लिए किसी की हो चुकी हूं देव" से वही संदेश दिया जो गुमराह फिल्म के मीना ने "यहां कोई मीना नहीं रहती है" के अंतिम डायलोग से! इस डायलोग के तुरंत बाद दरवाजा बंद होने की जो आवाज हुई वह विचलित सी कर गई। मीना कुमारी ने जो भूमिका गुरूदत्त की प्यासा में निभाई कमोवेश वही उसने गुमराह में भी निभाया। कसर बस इतना सा महसूस हुआ कि गुमराह एक ऐसी चैराहे पर आकर ’’द एंड’’ हो गई जहां से दर्शकों का एक तबका गुमराह ही रह जाने के लिए अभिशप्त सा हो गया! मैं खुद को इसी तबके में देखता हूं।

      गुमराह में बैरिस्टर अशोक को अपनी धर्मपत्नी मीना से बार-बार यह कहते हुए फिल्माया गया है कि ‘‘औरतों को चार दिवारी के अंदर ही रहना चाहिए!" फिल्म आखिर में बैरिस्टर अशोक के इस संदेश को सही करार देते हुए खत्म हो जाती है शुरू में हीरो के रूप में सीन में आया सुनील दत्त परदा गिरने से ठीक पहले विलेन जैसा दिखने लगता है। सुनील दत्त को न उसकी प्रेमिका की सहानुभूति मिलती है और न ही फिल्म के निर्देशक की।  सुनील दत्त से सहानुभूति जतला कर भी कोई क्या कर लेगा?  हो सकता है गुमराह में भी अगर निर्देशक संवेदनहीन सा दिखता प्रतीत होता है तो उसकी वही मजबूरी रही होगी जो धड़कन फिल्म में सुनील शेट्ठी की मां के मर जाने के बाद भी सुनील पर रहम न करने वाले निर्देशक की होगी। सुनील को आखिर में महिमा चौधरी "गोद" ले लेती है, ऐसा निष्कर्ष निकाला जा सकता है क्यूंकि फिल्म में सुनील और महिमा को उस रूप में नहीं दिखाया गया है। निर्देशक ने इत्ता सा भी रील सुनील और महिमा की कहानी पर खर्च क्यूँ नहीं किया जब उन्हें अंत में मिलवाना था, यह सवाल एक दर्शक का है। क्या शीतल वर्मा के पिता ने देव से सवाल नहीं किये? देव ने तब क्या जबाव दिया! एक ही फिल्म में लव मैरेज में ऐसी-तैसी खिचड़ी खिलाकर निर्देशक ने पेट पे दे मारा!

     "क्या यही प्यार है" का राहुल संध्या को शादी से पहले ही लहरों की टकराहट के बीच छोड़ जाता है। वह नाराज है.... गुस्से में है..... परेशान है.... संध्या को पाने के चक्कर में उसके कई साल बर्बाद हो चुके और उसे अपने भगवान जैसे भाई को मुखाग्नि देने का मौका भी नहीं मिल पाया! अगर फिल्म चलती होती तो हो सकता है धड़कन की अंजलि की तरह संध्या किसी दूसरे राहुल से "ना ना करते प्यार...." कर गई होती! लेकिन राहुल जिस तरह से संध्या से अलग होने के बाद मिली नौकरी का ज्वाइनिंग लेटर देखते हुए झूम पड़ा था, उससे लग रहा था कि उसे "संध्या" से अधिक महत्व वाली चीज मिल गई है। बहरहाल, इसकी संभावना राहुल में नहीं थी कि वह राजेन्द्र की तरह अपनी प्रेमिका मीना की शादी हो जाने के बाद भी उसकी पेंटिंग बनाता रहे और उसे अपनी यादों में बसाए रखे! राहुल, राजेंद्र से करीब तीस साल बड़ा है क्यूंकि फ़िल्में समाज का आइना होती है!

      पहला प्यार भुलाया नहीं जाता, ऐसा मानने वाले काफी लोग हैं लेकिन काफी नहीं भी। ऐसा लगता है कि प्यार किसी दीवाल पर पोतने वाला रंग है। उस रंग को जमाए रखने के लिए आप उस पर लगातार पुताई करते रहें या फिर चाहें तो उसपर दूसरा रंग पोत दें। आपको पहले रंग का निशान तभी दिखेगा जब उपर वाला रंग बारिश में कमजोर हो जाएगा या फिर कोई नए वाले रंग को खरोंच देगा या फिर जब कोई आपको बता देगा कि देवदास चंद्रमुखी की कोठी पर पड़ा रहता है!

     इस सिक्का का दूसरा पहलू यह है जो लड़कियों को समझने में और उलझा देगा। याद कीजिये उस दादी को जो टीवी में दिखाए एक पेंटिंग से अपने प्रेमी को पहचान जाती है और अपनी पोती को टी वी का वोल्यूम बढाने को कहती है। टाइटेनिक जैसी फ़िल्में भारत में नहीं बनी तो "फिल्मे समाज का आइना होती है" का जुमला अपनी प्रासंगिगता बनाये हुए है। फ़र्ज़ कीजिये वो महिला उन असंख्य लम्हों को कैसे जी होगी जिसके मन में जहाज़ डूबने से ठीक पहले अपने प्रेमी के अंतिम स्पर्श की यादें संरक्षित थी। सहनशीलता की ये पराकाष्ठा तो सचमुच पूजनीय है लेकिन यह वेस्टर्न है। अंजलि खुश है और संध्या भी खुश ही होगी। आप या तो समाज को बदलिए या फिर आईने को।
                                                                                                                                                लिंक 


नोट:
ये टिप्पणी एक "बेकाबू प्रतिक्रिया" की तरह है, जो जनसत्ता में छपी इस टिप्पणी के बाद का काउंटर है। 
आप गौर करेंगे तो लेखिका ने अपने लेख में अपना "फ्रस्ट्रेशन लड़कों पर निकालने की वाहियात कोशिश की है! 
उनकी पंक्तियों पर गौर करें 
" मैं हैरान हूं कि मेरी शिकायतों से परेशान होने वालों में कुछ स्त्रियां भी हैं, लेकिन आमतौर पर पुरुष हैं।"
शुरुआत की इन पंक्तियों से मैडम जी ने अपने लेख को दिशा दी है और फिर आगे जाकर ये साबित करने की क्षमता भर कोशिश की है कि लड़के संवेदनहीन होते हैं। रिम्मी शर्मा के इस लेख को तीन दिनों तक कई बार पढ़ा और फिर उनकी मासूमियत पर हंसते हंसते लोट पोट हो गया।
बहरहाल, कुछ दोस्तों की सलाह पर अपन ने रिम्मी शर्मा के इस लेख का काउंटर उसी स्तम्भ में करने का निर्णय लिया था।

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