Wednesday, October 24, 2012

भ्रम




                                          डकैतों का मंदिर

       सालों बाद विन्ध्याचल जाना हुआ। दरकती आस्था और टूटती मूर्तियों के बीच वहां जाना मन में एक रोमांच पैदा कर रहा था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के चाणक्य छात्रावास से हम चार लड़के आॅटो से बस स्टैंड के लिए निकले, जहां से मिर्जापुर की बस लेनी थी। हममें से एक लड़का विन्ध्याचल के एक नामी पांडा का ‘‘सुपुत्र‘‘ था। भगवान नाम की संस्था पर से मेरा विश्वास मेरे बालिग होते ही टूटने लगा था, फिर भी बेमन से चला जा रहा था। मन ऐसा अस्थिर हुआ कि कैमरा और पहचान पत्र वाला बैग आॅटो में ही छूट गया। जैसी मां की मर्जी!

         मिर्जापुर उतरकर हमलोग वहां से विंध्याचल पहुंचे। करीब छह साल पहले जब मैं यहां आया था तो लंबी कतारें लगी होती थीं लेकिन इस बार अष्टमी में भी महज दो सौ लोग ही थे, जिसमें ज्यादातर ग्रामीण महिलाएं और बच्चे थे। हमलोग पूजनस्थल से करीब दस मीटर की दूरी पर प्रसाद की सामग्री खरीद रहे थे कि पुलिस और पांडा में झड़प की खबर उड़ी। थोड़ी ही देर में पुलिसकर्मियों की असामान्य गतिविधियों ने इस खबर की पुष्टि कर दी। पुलिस और पांडा में धक्कामुक्की और गालीगलौज को नजदीक से देखने का यह पहला अनुभव था। चूंकि कैमरा वाला बैग मेरा साथ छोड़ चुका था इसलिए चाह के भी इस ‘‘दैवी प्रकोप‘‘ की तस्वीर नहीं ले सका। 

          खैर, मूर्ति देखकर लौटा तो बतौर पत्रकार पूरा मामला जानने की इच्छा हुई। कुछ पांडा और पुलिसवालों से अनौपचारिक बातचीत शुरू की तो पता चला कि पांडा अपने क्लाइंट, माफ कीजिएगा, यजमान को शार्टकट में मूर्ति दिखाने के एवज में कमीशन, माफ कीजिएगा, दक्षिणा लेते हैं। इस कमीशन का एक हिस्सा वहां खड़े पुलिसवालों को भी दिया जाता है ताकि पांडों का धंधा निर्बाध बना रहे। लेकिन चूंकि अमीर भक्तों की संख्या इस बार कम हुई तो रूप्यों को लेकर पांडा और पुलिस के बीच विश्वास की डोर कमजोर हुई। इसके बाद पुलिस ने कुछ आम भक्तों की शिकायतों को आधार बनाकर पांडों पर शिकंजा कसना शुरू किया, जिसके बाद घमासान मच गया और पांडों ने मंदिर के सामने ही गोली लहरा दी। इसके बाद जो कुछ भी हुआ वह मेरे सामने था। 

       पांडों के साथ मेरा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह का अनुभव रहा है। बतौर पत्रकार कई पांडों और महंतों को नजदीक से जानने का मौका तो मिला ही है साथ ही इतिहास की किताबों में भी पांडों की करतूतें कई जगह अपनी जगह बना चुकी है। मुगल शासक औरंगजेव द्वारा काशी विश्वनाथ मंदिर तोड़े जाने की घटना के बारे में पट्टाभि सीतारमैया ने अपनी पुस्तक ‘‘फैदर्स एंड स्टोंस‘‘ में लिखा है कि - ‘‘तत्कालीन शाही परम्परा के अनुसार, जब मुगल सम्राट किसी यात्रा पर निकलते थे, तो उनके राजा-सामन्तों की बड़ी संख्या के अलावे उनका अंतःपुर भी चलता था। मुगल दरबार में हिन्दू सामंतों की संख्या बहुत थी। औरंगजेब जब बनारस के निकट से गुजर रहा था तब सभी हिन्दू दरबारी अपने परिवार के साथ गंगा स्नान करने और विश्वनाथ दर्शन के लिए मंदिर आए। दर्शन कर जब लोग बाहर निकले तो ज्ञात हुआ कि दल की एक रानी गायब है। यह कच्छ की रानी थी। इस रानी को मंदिर में जाते तो सबने देखा लेकिन आते किसी ने नहीं। अधिक कड़ाई और सतर्कता से खोजने पर रानी वस्त्राभूषण विहीन अवस्था में मंदिर के तहखाने में मिली। औरंगजेब को जब पांडों की यक काली करतूत मालूम हुई तो वक क्रुद्ध होकर बोला कि जहां मंदिर के गर्भ ग्रह के नीचे इस तरह की डकैती और बलात्कार हो, वहां ईश्वर नहीं हो सकता है। उसके आदेश के बाद मंदिर तोड़ दिया गया। रानी लुटने के बावजूद मंदिर का बचाव करती रही और उसने शहंशाह से मंदिर पुनः बनवाने का आग्रह किया लेकिन औरंगजेब ने अपने धार्मिक विश्वास के कारण वहां मस्जिद बना कर रानी की इच्छा पूरी की।‘‘ 

साहित्य अकादमी से सम्मानित किताब ‘‘कितने पाकिस्तान‘‘ को पढकर पता चलता है कि भारत में मुस्लिम शासक मुहम्मद बिन कासिम व अन्य मुस्लिम शासकों ने भारत में मंदिरों को धार्मिक उत्तेजना में नहीं तोड़़ा था बल्कि उस संपत्ति के लिए तोड़ा था जो मंदिरों के तहखानों में छुपा रहता था। पटना के प्रसिद्ध हनुमान मंदिर के तहखाने में हथियारों का जखीरा और दक्षिण भारत के पदमानाभ्स्वामी मंदिर में मिला रूप्यों व आभूषणों के भंडार मिलने के बाद इसकी पुष्टि होती है। अपने बैग खो जाने पर मेरी उदासी अपनी जगह है लेकिन मन खुश है कि विंध्याचल में इस बार लोग कम आए।

No comments:

Post a Comment