Sunday, September 9, 2012

दुनिया मेरे आगे



                                                  वर्दी की आड़ में 

       आटो वाला एक-एक कर सवारी चढा रहा था। अंतिम सवारी के रूप में मेरे बैठने के बाद वह जैसे ही आगे बढने  के लिए एक्सलेटर घुमाया, ठीक सामने फिल्मी अंदाज में पुलिस की गाड़ी आकर रूकी। आटो वाले को उस गाड़ी की आगे वाली सीट पर चालक के बगल में बैठे एक वर्दीवाले ने इशारे से बुलाया। आटोवाले के एक तरफ मैं और दूसरी तरफ एक और सज्जन बैठे थे। जैसे ही आटोवाला आटो से बाहर निकला पीछे बैठी एक सवारी उतर कर दूसरे आटो में जा बैठी। हालांकि आगे वाली सीट पर अभी भी आटो वाले के अलावे हम दो लोग बैठे आटो चलने का इंतजार कर रहे थे।


          ओटो वाले के आग्रह पर उसका नाम यहाँ नहीं दिया गया है। 
       करीब तीन मिनट तक पुलिस वाले ने आटो वाले से कुछ बात की और फिर आटो वाला फुर्ती में आटो के पास आया और सीट के नीचे से कुछ कागजात ले जाकर उन्हें दिखाने चला गया। मैं दफ्तर को पहले ही देर हो चुका था लेकिन आटो वाले की बेचारगी देखकर दूसरे आटो में जाने के लिए नैतिकता को लेकर असमंजस में था। ऐसा नहीं था कि मेरे जाने के बाद उसे सवारी नहीं मिलती लेकिन यह जरूर था कि उसे एकबारगी यह लग सकता था कि दुनिया काफी मतलबी है।  
   

 खैर, करीब पांच मिनट तक कागज की पड़ताल करने के बाद आटो वाला फिर से आटो की तरफ लौटा तो जान में जान आई। लगा कि अब चल देंगे लेकिन ये नोएडा की आवारा पुलिस थी! आटो वाले ने अंदर आकर सवारियों से पूछा कि किन्हीं के पास सौ रूप्ये है तो दे दीजिए! देरी को लेकर पहले से चिढे सवारियों की गाली के बीच एक सज्जन से उसे सौ रूप्ये दे दिए। उन्हें अशोक नगर से सेक्टर-62 तक जाना था। रूप्या वर्दीवाले को देकर जब अंतिम बार वह आटो में आया तो मैंने उत्सुकतावश  पूछ लिया कि ये रूप्ये उन्हें क्यूं दिए जबकि तुम्हारे पास पूरे कागजात थे। मानो मैंने उसके दुखते रग पर हाथ रख दिया। उसने बोलना शरू  करने से पहले कम से कम पंद्रह गालियां दी और फिर कहा कि उसके पास डीएल, इंश्योरेंस, परमिट सहित सभी कागजात थे लेकिन पुलिस की गाड़ी में बैठा वह वर्दीवाले ने उसे साफ कहा कि जबतक रूप्ये नहीं देगा वह उसे जाने नहीं देंगे। यह पूछने पर कि कागजात देखने के बाद उन्होंने क्या कहा, उसका जवाब था कि उन्होंने कागजात को गलत बताया। हम बातचीत कर ही रहे थे कि उसने आटो धीरे कर दो और लोगों को आगे चढा लिया। अब आॅटो की अगली सीट पर पांच लोग हो गए थे। इन दो लोगों को अतिरिक्त बिठाने से आटो वाले की क्षतिपूर्ति निश्चित रूप से नहीं हो सकती थी, लेकिन उसका घाटा कम जरूर हो सकता था। नोएडा में जब लोकल किराया पांच से सात रूप्ये हुआ तब सवारियों ने ओटो वाले को पानी पी पीकर कोसा। खूब कोसा। लेकिन जब नोएडा पुलिस ही गरीब आटो चालकों को मनमानी और नियम तोड़ने के लिए बाध्य कर दे तो बेचारे आटो चालकों की इसमें क्या गलती! 
     

बहरहाल, इस बीच अपन ने पत्रकारिता धर्म निभाते हुए पुलिस की उस गाड़ी की तस्वीर छिपाते हुए ले ली। अगर मैं देर में नहीं होता तो दूर से पूरी घटना का वीडियो जरूर बनाता लेकिन चूंकि मैं देर में था और पुलिस से उलझ कर अपना समय खराब नहीं करना चाहता था इसलिए चुपचाप फोटो ली और आफिस चला आया। आफिस में अपराध संवाददाता से जब मैंने इस मामले पर बात की तो उन्होंने फेसबुक पर पूरा वाक्या डालकर नोएडा पुलिस को टेग करने की सलाह दी। उनकी सलाह पर यह पोस्ट ब्लाग पर लिखकर नोएडा पुलिस को टेग कर रहा हूं। इसबीच मैंने पुलिस की उस गाड़ी का नंबर नोट किया था जो UP 16 G.0256  है।

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