Tuesday, July 31, 2012

राखी


                                                         पितृसत्तात्मक समाज का उत्सव

       भारतीय उपमहाद्वीप में हर साल यह मनाया जाता है। पितृसत्तात्मक समाज में इसे रक्षाबंधन त्यौहार को बड़े पर्व के रूप में देखा जाता है। सभी जाति, वर्ग और उम्र की महिलाएं और पुरूष रक्षाबंधन को मनाते हैं। इस "शुभ दिन" महिलाएं अपने भाई के कलाई पर रेशम की डोर बांधकर अपनी सुरक्षा की मांग उससे करती है। इस त्यौहार पर कई गानें भी ऐसे बने हैं जिससे इस धारणा को बल मिलता है. इसके बदले में भाई अपनी बहन को उसकी सुरक्षा करने का वायदा करता है। 

       हालांकि इस समाज में इस तरह का कोई त्योहार नहीं है जिसमें महिलाएं अपने भाई को कुरीतियों और बुराइयों बचने का वादा करती हो या जिसमे बहन अपने भाई की रक्षा करने का वादा करती हो. आज का मध्यवर्ग तेजी से व्यापक हो रहा है और उसके अंदर बड़ा तबका शिक्षा को लेकर काफी संजीदा हो रहा है। तकनीक आधारित क्रांति की पैठ मध्यवर्ग के बीच पहुंच चुकी है। ऐसे दौर में महिलाएं भी आर्थिक रूप् से पहले से काफी ज्यादा स्वायत्त और मजबूत हुई हैं। इन सब के बावजूद अभी से एक दिन के बाद सभी लोग रक्षाबंधन मनाएंगे। यह सदियों से मनाया जा रहा है लेकिन अबतक किसी ने ऐसा नहीं कहा कि अब जबकि महिलाएं शिक्षित, आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी होने लगी हैं, ऐसे में वह अपनी रक्षा खुद करने में समर्थ हैं और रक्षा बंधन अप्रासंगिक हो चुका है और इसे मनाने की कोई वजह नहीं है। महिलाओं को आत्मनिर्भर होने के लिए प्रोत्साहित करने की बजाय यह समाज ऐसा त्यौहार मनाकर यह साबित करना चाहता है कि महिलाएं अब भी अतिसंवेदनशील वस्तु है। इस त्यौहार से यही संदेश जाता है कि महिलाएं इतनी कमजोर हैं कि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए हमेशा किसी पुरूष की जरूरत होती है। 

       दरअसल, हमारे समाज में महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी पैत्रिक संपत्ति अपने भाई के नाम कर दे। महिलाओं को संपत्ति के अधिकार से वंचित रखा जाता है. इसके अलावे कई महिलाओं को उनके पति के द्वारा प्रताडि़त किया जाता है क्योंकि उनके भाई उनका साथ नहीं देते। कई महिलाएं मदद न मिल पाने के कारण हर साल बड़ी संख्या में आत्महत्या तक कर लेती हैं। कई विधवा महिलाओं को उनके भाई और परिवार द्वारा परित्यक्त कर दिया जाता है और वे वृन्दावन में जाकर बस जाती हैं और उनके पास अपनी मौत का इंतज़ार करने के अलावे कोई विकल्प नहीं रह जाता है. झूठी शान के लिए भाई द्वारा बहन की हत्या किए जाने की घटनाएँ प्रकाश में आती रहती है। इनमे से कोई भी घटना अपवाद नहीं है. 

        रक्षाबंधन को लेकर हर साल बढ़ता उल्लास समाज में महिलाओं के लिए खतरे की घंटी है। क्योंकि यह त्यौहार पुरूष प्रधानता और महिलाओं के अबला होने की रूढ़ीवादी धारणा पर आधारित है।

            तसलीमा नसरीन के ब्लॉग पर प्रकाशित लेख का हिंदी अनुवाद. मूल पोस्ट के लिए इस लिंक पर चटका लगायें.

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