Saturday, June 30, 2012

धर्म की धार



                                   अलगाव, उन्माद और सामाजिक न्याय

       मालदीव में पिछले दिनों हुए सत्ता परिवर्तन ने एक फिर यह साबित कर दिया कि सत्ता पाने या उसका विस्तार करने के लिए बतौर हथियार के रूप में धर्म का एकाधिकार बना हुआ है। सार्क देशों में मालदीव ऐसा दूसरा देश  बन गया है जहां राष्ट्रपति को न्यायपालिका से भिड़ंत के कारण अपनी गद्दी छोड़नी पड़ी। मालदीव में लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद को पद से हटाने के लिए विपक्षी पार्टी के नेता अब्दूल गयूम ने उनके उपर गैर इस्लामिक होने का आरोप जड़ा और उन्माद की ऐसी हवा चलाई कि भयंकर रक्तपात के भय से पूरा देश  हिल गया। धार्मिक उन्माद ने ऐसा असर दिखाया कि पहली बार लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार के राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद को अपने पद से इस्तीफा दे देना पड़ा।
        दरअसल मालदीव मुस्लिम बहुल देश है और यहां तीस साल तक लगातार मौमून अब्दूल गयूम का राज रहा था। लेकिन लगातार बढ़ते जनांदोलनों के कारण 2008 में लोकतांत्रिक ढंग से यहां चुनाव कराया गया और सरकार चुनी गई। मोहम्मद नशीद राष्ट्रपति चुने गए। लेकिन तीस साल से यथास्थिति बनाए रखने वाली व्यवस्था ने  नशीद  को कभी चैन से बैठने नहीं दिया। इस बीच सरकार को अस्थिर करने की कई कोशिशें भी हुई लेकिन वे व्यर्थ गईं। ये चुनौतियां न केवल तीस साल से राजसुख ले रहा विपक्ष पैदा कर रहा था बल्कि तब की न्यायपालिका जो स्वेच्छाधारी सरकार की वफादार थी, भी  नशीद  के सामने समस्याएं पैदा कर रही थीं। दो साल पहले 2010 में जब  नशीद  अपनी कैबिनेट के कई सदस्यों के इस्तीफे के बाद फिर से नियुक्त की प्रक्रिया शुरू की थी, वहां सर्वाच्च न्यायपालिका ने इसपर अवरोध पैदा कर एक तनाव भरी स्थित पैदा कर दी थी। मालदीव के न्यायपालिका के बारे में जानना अपने आप में दिलचस्प है। यहां के न्यायपालिका के सदस्यों को देखें तो उनमें से पचास प्रतिशत सातवीं कक्षा तक भी पढ़े लिखे नहीं हैं और लगभग तीस प्रतिशत जजों का आपराधिक रिकोर्ड रहा है। जिसमें बाल यौन शोषण से लेकर आतंकवाद शामिल है। वहां के क्रिमिनल कोर्ट के मुख्य न्यायाधीष अब्दुल्ला मोहम्मद के खिलाफ भी कई मामले चल रहे हैं। उनके खिलाफ बाल यौन शोषण  का भी आरोप था जिसमें कार्रवाई से बचने के लिए पिछले साल सितंबर में कोर्ट इंजक्सन  का सहारा लिया था। न्यायाधीश मोहम्मद को विपक्षी पार्टी गयूम का विश्वासपात्र  माना जाता है। मौजूदा संकट की मुख्य वजह  न्यायाधीश  मोहम्मद और अब्दूल गयूम की मिलीभगत ही मानी जा रही है। क्योंकि  नशीद  ने क्रिमिनल कोर्ट के मुख्य  न्यायाधीश  मोहम्मद पर भ्रष्टाचार के कई मामलों में संलिप्तता के कारण उन्हें पद से हटाने की पूरी तैयारी कर ली थी। लेकिन इसी बीच अपनी कठपुतली को इस तरह कमजोर होते देख विपक्षी पार्टी ने नशीद के खिलाफ धार्मिक उन्माद को हथियार बनाकर मैदान में उतार दिया. यह प्रचार जोर शोर से किया गया कि नशीद इस्लाम विरोधी और ईसाई समर्थक हैं। कई जगहों पर तोड़फोड़ की गई और आखिरकार भयंकर रक्तपात को रोकने के लिए नशीद ने इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा के बाद अपने प्रेस वार्ता में उन्होंने  साफ किया कि उनसे बंदूक की नोक पर इस्तीफा लिया गया है और अगर वे इस्तीफा नहीं देते तो सेना और पुलिस में झड़प् होती और आम जनता के जानमाल की हानि होती। यह कहने की जरूरत नहीं है कि इस पुलिस विद्रोह का जन्म विपक्षी पार्टी प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ़  मालदीव के नेता अब्दुल गयूम द्वारा फैलाए धार्मिक उन्माद के बीच हुआ। 
       हालांकि गयूम के शासनकाल में चरमपंथी इस्लामिक गतिविधियों पर नियंत्रण रखकर धर्मनिरपेक्षता को बनाये रखने की कोशिश  की गई थी पर 2008 के चुनाव में जीत के लिए गयूम सरकार ने मुस्लिम धर्म की राजनीति का सहारा लिया और लोकतंत्र समर्थक नशीद को इसाई समर्थक बताकर जनभावना भड़काने का प्रयास किया। हालांकि इससे कोई सफलता नहीं मिल पाई पर इस्लामिक कट्टपंथियों का प्रभाव लगातार बढ़ता रहा है। हाल के सत्ता हस्तांतरण की घटना के दौरान कई सोशल साइट पर चरमपंथियों ने लिखा कि नशीद  को सुन्नी कानून के अनुसार सर धड़ से अलग कर दिया जाये क्योंकि कुछ इस्लामिक समूहों का दावा है कि उनके आवास पर शराब  की बोतलें पाई गई हैं, जो वहां के कानून के अनुसार अपराध है। 
      इस्लाम का डर दिखाकर हित साधने का एक और सटीक उदाहरण बलूचिस्तान का है। कोई भी देश  सामाजिक न्याय के सवाल को सतह पर आने नहीं देना चाहता। भारत में सामाजिक न्याय के सवाल को नक्सली खतरे से ढ़का जाता है। बहरहाल, पाकिस्तान और बलूचिस्तान का मामला इस्लाम के हौवा खड़ा कर हित साधने का बेजोड़ नमूना है। पश्चिमी पाकिस्तान के बंटवारे और लगातार अलग-अलग क्षेत्रों में आत्मनिर्णय को लेकर हो रहे विरोध के कारण पाकिस्तान और उसे नियंत्रित कर रही पश्चिमी  ताकतों की परेशानी  किसी से छिपी नहीं है। लेकिन पाकिस्तान के कई क्षेत्रों में शोषण, उपेक्षा, मानवाधिकार के लिए उठ रही आवाजें और विद्रोह के स्वर को दबाने के लिए भी कथित इस्लामिक आतंकवाद के खतरे को ढाल बनाया गया है। दरअसल बलूचिस्तान पूरे पाकिस्तान प्रांत का 44 प्रतिशत  हिस्सा है, जो खनिज के क्षेत्र में समृद्ध  है। पर इस क्षेत्र का न केवल पाकिस्तान द्वारा बिना इस क्षेत्र के हिस्सेदारी के, खनिजों का शोषण  किया जा रहा है बल्कि चरमपंथी गुटों एवं अलगाववादी गुटों पर नियंत्रण रखने के नाम पर उन पर सैन्य कार्रवाई की जा रही है। एक पत्रिका द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार वर्ष  1952 में इस क्षेत्र के डेरा बुगती के सूई में गैस के भंडार का पता लगाया गया। वर्ष  1954 से यहां से गैस का उत्पादन शुरू  हो गया और उसका लाभ पूरे पाकिस्तान को मिलने लगा लेकिन बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा को वर्ष  1985 में जाकर इस पाइपलाइन से जोड़ा गया। इसी क्षेत्र के चगाई मरूस्थल में वर्ष  2002 से सड़क परियोजना शुरू  की गई। जो कि चीन के साथ तांबा, सोना एवं चांदी उत्पादन करने की पाकिस्तानी योजना है। इससे प्राप्त लाभ में चीन का हिस्सा 75 फीसदी है एवं बचा 25 फीसदी पाकिस्तान का। इस 25 फीसदी में से इस क्षेत्र को महज 2 प्रतिशत  की हिस्सेदारी दी गई है। इसके अलावे मानवाधिकार के विषयों  को देखें तो यहां पाकिस्तानी सेना शांति  बनाए रखने के नाम पर लोगों के अपहरण एवं हत्या करने में संलग्न है। यहां के हालत के बारे में दुनिया अनभिज्ञ रहे इसलिए इलेक्ट्रनिक एवं प्रिंट मीडिया पर कई पाबंदिया हैं और साथ ही पत्रकारों पर जुल्म भी किए जाते हैं। यहां इंटरनेट ब्लाॅक कर दिया गया है और आम लोगों की आवाजें दबाने के लिए हर उपाय किए जा रहे हैं। बलूच लोगों को हिंसा और गैर कानूनी हत्या का शिकार  बनाया जाना यहां के लिए आम बात है। पाकिस्तान के ह्युमन  राइट कमीशन  की 2011 की रिपोर्ट बताती है कि 140 लापता व्यक्तियों के यातनाएं दिए हुए शव  जुलाई 2010 से मई 2011 के बीच बरामद हुए हैं। अलबत्ता खबरें यह भी हैं कि पाकिस्तान इस पूरे क्षेत्र का तेजी से सैन्यीकरण कर रहा है और इसक पीछे तर्क दे रहा है कि ऐसा चरमपंथी गुटों पर नकेल कसने के लिए किया जा रहा है। प्राकृतिक  संसाधनों से मालामाल बलूचिस्तान से पाकिस्तान की कुल प्राक्रतिक गैस का एक तिहाई निकलता है। बलूचियों के साथ कई गंभीर समस्याएं हैं। मसलन उनका कहना है कि बलूचिस्तान में अधिकाँश सरकारी कर्मचारी या अफसर पंजाब प्रांत से संबंध रखते हैं, इसलिए बलूचियों को नौकरी नहीं मिल पाती।  गौरतलब है कि बलूच अलगाववादियों और पाक सरकार के बीच इस विवाद की शुरुआत  पाकिस्तान के निर्माण के कुछ समय बाद ही हो गई थी। 15 अगस्त, 1947 को बलूचिस्तान ने आजादी का ऐलान भी कर दिया था लेकिन 1948 में उन्हें दबाव के तहत पाक के साथ मिलना पड़ा अप्रैल 1948 में पाक सेना ने मीर अहमद यार खान को जबरन अपना राज्य कलात छोड़ने पर मजबूर कर दिया। 
      अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश के बारे में माना जाता है कि उन्होंने कई बार हवाईअड्डे पर विशेष चौकसी  बरतने का निर्देष दिया था जो उनकी उस पीआर का एक हिस्सा था जिसके तहत वो अमेरिकी लोगों के मन में एक असुरक्षा का माहौल बनाकर ईराक पर हमला कर सकें। विकीलिक्स ने जब यह खुलासा किया था कि भाजपा नेता अरूण जेटली ने अमेरिकी राजदूत से यह कहा कि वह धार्मिक उन्माद सिर्फ मतदाताओं को रिझाने के लिए पैदा करते हैं तो इसमें आश्चर्य  करने वाली कोई बात नहीं थी क्योंकि खासकर दूसरे विश्व युद्ध के बाद से धर्म एक आजमाया हुआ हथियार बन गया है। यह वही हथियार है जिससे भाजपा वेल्लारी में अपने ही पूर्व मंत्री के द्वारा की जा रही लूट को छिपा लेती है और यही वो धर्म है जिसके सहारे कांग्रेस को मुस्लिम मतदाता लगातार आॅक्सीजन प्रदान करते रहते हैं।


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