Thursday, June 7, 2012

अतीत



                                                     घूस की चाट

ई बार कई लोगों से कहते सुना है कि करप्शन खत्म नहीं हो सकता। मेरे मकान मालिक तो अन्ना से सहानुभूति जताते हुए कहते हैं कि चलो बेचारा कम से कम प्रयास तो कर रहा है। लगता तो ऐसा है कि हम किसी पत्थर से पानी निकालने की कोशिश कर रहे हैं यानि कितनी भी मेहनत कर लो होगा कुछ नहीं। पिछले कई दिनों से करप्शन के बारे में सोचता ही जा रहा हूं। 

रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी एक किताब में लिखा है कि धर्म के बारे में अगर आपने ज्यादा सोचा तो आपके नास्तिक हो जाने की संभावना ज्यादा है। इसी तरह की सोच अब भ्रष्ट व्यवस्था को लेकर भी घर करने लगी है। मसलन अगर आप सरकारी योजनाओं और निजी क्षेत्रों के करप्शन को एक तरफ छोड़ कर आम जनजीवन में घुल चुके भ्रष्टाचार पर विशेष गौर करें तो आखिरकार आप आंखे बंद कर लेंगे।
          
बात करीब पंद्रह साल पुरानी है। मैं सातवीं में प्रवेश किया था। कक्षा को अनुशासित रखने के लिए जल्द ही एक मोनिटर की नियुक्ति कर दी गई। संयोग से वह छात्र मेरे मुहल्ले का ही था और हमलोग साथ ही स्कूल जाते-आते थे। 

स्कूल जाने के लिए कभी वो मुझे बुलाने आ जाता तो कभी मैं उसे बुलाने उसके घर चला जाता। हमलोग टिफिन भी साथ खाते थे। कक्षा में तब मोनिटर का काम ये होता था कि वह कक्षा में सर के नहीं रहने पर हल्ला मचाने वाले छात्रों के बारे में शिक्षक को सूचित करे या फिर टिफिन में जो छात्र भाग गए हों उनकी सूचि बनाकर टिफिन के बाद होने वाली कक्षा में आनेवाले शिक्षक को सौंप दे। 

एक दिन मैं उसे बुलाने उसके घर गया तो देखा कि उसके पिता जी के साथ स्कूल के एक शिक्षक चाय पी रहे हैं। स्कूल जाते वक्त साइकिल चलाते हुए बातचीत में पता चला कि उसके पापा और वह शिक्षक दूर के रिश्तेदार हैं।        

एक दिन मेरे बड़े भैया बीएचयू से आए हुए थे और उन्हें कल होकर सवेरे ही वापस जाना था। मैंने दीपक से कहा कि वह सर को न बताए कि मैं हाफ टाइम में चला गया हूं। अगर सर पूछें तो कह दे कि मैं शौचालय गया हूं। दीपक मान गया। अगले दिन मैंने स्कूल के सामने की ठेली से दीपक को फूल प्लेट चाट खिलाया। 

मैं खुश था कि मुझे भैया से मिलने का पूरा समय मिल गया था। संयोग से एक बार फिर मुझे हाफ टाइम में जाना था सो मैंने दीपक को फिर से वही कहा। इस बार भी दीपक मान गया लेकिन उसने कहा कि बदले मे मैं उसे एक प्लेट चाट खिलाउं। मैने हां कर दी और कल होकर स्कूल आने से पहले मां से दस रूप्ये भी मांग लिए ताकि हम दोनों चाट खा सकें। इसके बाद मैंने हाफ टाइम में स्कूल से भागने के लिए कई बार दीपक को चाट खिलाए लेकिन एक बार मम्मी ने पैसा देने से मना कर दिया।

 दीपक बिना पैसे के नहीं मान रहा था और उसने मुझे धमकाना शुरू किया कि अगर मैंने उसे चाट नहीं खिलाया तो वह सर को बता देगा। इस बात पर हम दोनों में झगड़ा भी हो गया। फिर हम दोनों में कभी दोस्ती नहीं हो पाई। अभी हाल में पता चला कि दीपक को बिहार पुलिस में नौकरी लग गई है। 
       
 मैं अब इस अपराधबोध से ग्रस्त हूं कि दीपक को मैंने भ्रष्ट बनाया लेकिन मेरे पास विकल्प क्या था? हाफ टाइम में छुट्टी के लिए दस रूप्ये की पेनाल्टी लगती थी स्कूल में, जिसे बचाने के लिए मैंने दीपक को पांच रूप्ये का चाट खिलाया था। दीपक मोनिटर इसलिए था क्योंकि वह उस शिक्षक का रिश्तेदार यानि उस जाति का था जो शिक्षक हमें पढाते थे। 

स्कूल के शिक्षक इतने कठोर थे कि भैया से मिलने के लिए वह मुझे छुट्टी नहीं देते, उल्टे छड़ी से पीटाई होती सो अलग। दीपक बिहार पुलिस में ईमानदारी से अपना काम कर रहा होगा इसपर मुझे संदेह है। हो सकता है  कि  वह किसी चोर को चाट के बजाय दारू की शर्त पर छोड़ रहा होगा लेकिन क्या कोई ऐसी व्यवस्था है जो दीपक को अब ईमानदार बना सकती है और मुझे मेरे किए की सजा दिला सकती है?

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