Wednesday, May 9, 2012

ऑपरेशन एकलव्य



मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया द्वारा किए फर्जीबाड़े का पर्दाफाश हुए अभी ठीक से दो साल भी नहीं हुआ है। इसी बीच वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंदर इसी तरह के एक और फर्जीबाड़े की आशंका बनती जा रही है। सूचना के अधिकार के तहत हासिल किए गये कुछ दस्तावेजों को देखकर ऐसा लगता है कि उक्त मंत्रालय के तहत काम करने वाली संस्था क्वालिटी काउंसिल आफ इंडिया के अंदर काफी कुछ ऐसा हो रहा है जो यह साबित करता है कि यह संगठन निजी अस्पतालों से अवैध धन उगाही के लिए ही स्थापित की गई है।

इस पूरी किस्त को समझने के लिए यह जरूरी है कि आप जानते हों कि,


क्वालिटी काउंसिल आफ इंडिया क्या है?
क्यूसीआई एक वैधानिक संस्था है, जो वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले डिपार्टमेंट आफ इंडस्ट्रियल पालिसी एंड प्रोमोशन के अंदर काम करता है। यानि कि उक्त मंत्रालय इस संस्था का नोडल मिनिस्ट्री है। इसका गठन अस्पतालों की गुणवत्ता को बनाए रखने सहित अन्य उद्येश्य से 1997 में किया गया था। इसे 38 सदस्यीय परिषद द्वारा निर्देशित किया जाता है। ये सदस्य एसोचैम, फिक्की, सीआईआई, भारत सरकार और उपभोक्ताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। संस्था के अध्यक्ष की नियुक्ति भारत के प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है। फिलहाल योजना आयोग के सदस्य अरूण मायरा इसके अध्यक्ष हैं। यह संस्था अस्पतालों को निर्धारित मापदंडों पर खरे उतरने पर उन्हें एनएबीएच  यानि कि नेशनल एक्रेडेशन बोर्ड फोर होस्पिटल एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स की मान्यता देती है। आसानी से समझने के लिए इसे ऐसे समझा जाता है कि जिस तरह गुणवत्ता के आधार पर उत्पादों को आईएसआई मार्क या फिर टूथपेस्ट को आईएमए मान्यता दी जाती है यह मान्यता भी उसी तरह है।

मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया का मामला क्या था? क्यूसीआई का मामला एमसीआई की तरह ही कैसे है?
2010 में मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया का स्कैंडल सामने आया था। यह पता चला था कि एमसीआई द्वारा पटियाला के ज्ञान सागर मेडिकल काॅलेज को कथित तौर पर मोटी रकम लेकर मान्यता दे दी गई थी। मामला प्रकाश में आने के बाद सीबीआई ने 22 अप्रैल, 2010 को एमसीआई के अध्यक्ष केतन देसाई को गिरफ्तार कर लिया और राष्ट्रपति ने 15 मई, 2010 को संस्था भंग कर दी।
आरटीआई से मिली कुछ जानकारी इस ओर इशारा करती है कि क्यूसीआई ने भी एमसीआई के तर्ज पर दिल्ली के दो और एनसीआर के एक नामी अस्पताल को एनएबीएच की मान्यता दे दी। इसलिये क्यूसीआई और एमसीआई का मामला एक जैसा है।

                                       
ऑपरेशन एकलव्य की पहली किस्त

                                कौन है क्यूसीआई का सेक्रेटरी जेनेरल?

सूचना के अधिकार के तहत जो जानकारी भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, जो कि क्यूसीआई का कार्यदायी मंत्रालय भी है, ने दी है उसके अनुसार क्यूसीआई का अंतिम सेके्रटरी जेनेरल गिरधर जे ज्ञानी थे जिन्हें जनवरी, 2011 में ही कार्यमुक्त कर दिया गया।



वहीं दूसरी ओर सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में क्यूसीआई ने 2012 में भी गिरधर जे ज्ञानी को सेक्रेटरी जेनरल करार दिया है।



             इसके अलावा क्यूसीआई के आफिसियल वेबसाइट पर भी गिरधर जे ज्ञानी को सेके्रटरी जेनेरल  करार दिया गया है।



इस बाबत गिरधर जे ज्ञानी से ई मेल के जरिये उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई। ई मेल से दिए जवाब में ज्ञानी ने इस पूरे घटनाक्रम को दुर्भाग्यजनक बताया। उनका कहना है कि क्वालिटी काउंसिल आफ इंडिया के गवर्निंग बाडी की सहमति से वह अपना काम कर रहे हैं। संस्था का प्रशासनिक और आर्थिक नियंत्रण गवर्निंग बाडी के पास ही रहता है। उनके अनुसार गवर्निंग बाडी ने उनका कार्यकाल 31 अगस्त, 2012 तक के लिये बढा दिया है। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा है कि जबतक नये सेके्रटरी जेनरल की नियुक्ति नहीं होती है तबतक वही जेनरल सेक्रेटरी रहेंगे। ज्ञानी यह भी कहते हैं कि डिपार्टमेंट आफ इंडस्ट्रियल पालिसी और प्रमोशन ने उनका कार्यकाल 2 जनवरी, 2012 तक बढाया था लेकिन क्यूसीआई के चेयरमैन के हस्तक्षेप के बाद वो अब तक संस्था के जेनरल सेके्रटरी बने हुए हैं।
क्यूसीआई की संरचना
यानि कि सरकार जिसे कार्यमुक्त बता रही है वो बतौर सेक्रेटरी जेनेरल अपना काम एक ऐसी संस्था में कर रहा है जो संस्था उसी सरकार से फंड लेती है जो उसे अवकाश पर जाने का आदेश दे चुकी है.

                                                                                                                                     जारी ...


 

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