Thursday, May 17, 2012

वो दिन



                                                            आदत जाती नहीं

        बचपन की कुछ आदतें जाती नहीं। इन आदतों के कारण कई बार शर्मिंदा होना पड़ता है तो कई बार खुद से झगड़ना पड़ता है। ऐसी ही एक आदत है नियमें तोड़ कर और झूठ बोलकर  मटरगस्ती  करना। पिछले दिनों इस आदत के कारण बुरी तरह शर्मिंदा होना पड़ गया।
      दरअसल, स्कूल के दिनों में कक्षा छोड़ कर कुछ आवारा टाइप के दोस्तों के साथ सिनेमा देखने जाने या यूं ही कहीं विचरण करने के लिए निकल जाने की लत लग चुकी थी। यह लत  संस्कृत  के उस शिक्षक के कारण लगी थी जिसे कक्षा में घुसते ही सबसे पहले मेरे शर्ट के जेब पर स्याही लगती दिखती थी। फिर वो शिक्षक मुझे अपनी कुर्सी के पास बुलाते और कोई भी श्लोक का मतलब पूछ डालते। उनकी मार खाने के बाद ही अक्सर घंटी बजती थी। इसलिए मैंने पिछले बैंच पर  बैठना  शुरू कर दिया था और फिर धीरे धीरे कुछ ऐसे दोस्तों के सम्पर्क में आया कि जैसे ही संस्कृत वाले सर कक्षा में आगे से घुसते हमलोग पीछे के दरवाजे से भाग लेते। भाग के सिनेमा देखने का अपना मजा होता था। यही आदत कालेज में भी रही। इंटर की पढाई करते करते पढाई से मन इतना उचट गया था कि घर में किसी के नहीं होने पर रात में नौ से बारह का शो भी देख आते थे। राजेश खन्ना का अवतार वो आखिरी शो था जो उन प्यारे लफंगे दोस्तों के साथ मैंने बेगूसराय के दीपशिखा सिनेमा हाल में देखी थी।   
      बहरहाल, तीन साल पहले दिल्ली आना हुआ। यहां आईआईएमसी में पढते हुए सिनेमा देखने की आदत तो नहीं रह पाई लेकिन प्रगति मैदान, गांधी शांती प्रतिष्ठान, कंस्टूट्यूशन क्लब, ऐबाने गालिब, उर्दू घर आदि जगहों पर हो रही बहस में जाने का नशा जरूर लग गया। हालांकि सिनेमा का गिरता स्तर और देश की वास्तविकता से उसके घटते जुड़ाव के अलावे दिल्ली में टिकट की बढती कीमत इसकी बड़ी वजह थी बावजूद लैपटाप पर डाक्यूमेंट्री फिल्म देखना जारी रहा। कभी प्रसिद्ध कवि गिरदा पर तो कभी गुजरात दंगे पर बनी फिल्म ‘फाइनल साल्यूशन‘। हालांकि पाठ्यक्रम की पुस्तकों से काफी पहले ही मोहभंग हो चुका था लेकिन दुनियादारी सामाजिक तानेबाने को लेकर समझ विकसित करने के नशे ने कालेज छोड़ कभी गंगा ढावा तो कभी अन्य जगहों पर आयोजित बहस, सम्मेलन, गाष्ठि आदि जगहों पर जाने के लिए बाध्य कर दिया। खैर, धीरे धीरे कालेज के दिन भी खत्म हो गए।
        तीसरा पहर शुरू  हुआ। अखवार के दफ्तर में उपसंपादक की नौकरी मिली। एनसीआर के पाठकों के लिए प्रकाशित अखवार में काम करते करते दिल्ली में हो रहे कार्यक्रमों की जानकारी मिलनी भी साथ साथ शुरू हुई। कहते हैं सिगरेट छोड़ चुके आदमी को अगर आप सिगरेट के धुंए में खड़े कर दे तो वह सिगरेट पीने के लिए आतुर हो जायेगा। ऐसा ही हुआ। आफिस से हर महीने कोई न कोई बहाना करके किसी न किसी सेमिनार में कभी कुछ बोल आता था तो कभी किसी को सुनने की चाह में इधर से उधर भागते रहता था। पिछले दिनों प्रभाष जोशी के जन्मदिन पर आईटीओ के पास के उर्दू घर में एक कार्यक्रम होने की खबर लगी। प्रभात खबर के संपादक हरिवंश का व्याख्यान वहां होना था। हरिवंश को सालों से पढने के बाद उन्हें सुनने की प्यास ऐसी जगी कि आफिस में छुट्टी का आवेदन दे दिया। आवेदन एक झटके में खारिज कर दिया गया यह कहकर कि उस दिन दो और लोग छुट्टी पर हैं। ''मन भयो बाबरा, चैन न आवे दिन रैन...''। 
      हरिवंश जी रांची में रहते हैं, करीब चार साल बाद उन्हें नजदीक से सुनने का मौका मिल रहा था, इसके बाद क्या पता फिर मौका मिले या न मिले। आखिरकार तय हुआ कि परीक्षा का बहाना बनाया जाये। हल्ला हुआ लेकिन छुट्टी फिर भी नहीं मिली। अखवारों में अंतिम विकल्प संपादक का  दरबार होता है। अभयदान वहीं मिला करता हैं। लेखा विभाग से पिछले तीन महीने की कुंडली निकलवाई और रख दिया संपादक जी के सामने। परीक्षा की बात से छुट्टी मिलने का दावा पहले से मजबूत था और दूसरा दावा उस कुंडली में था जो यह प्रमाणित करता था कि मैंने पिछले कई महीनों से एकाध छुट्टियां ही ली है। अलग बात है कि हर महीने करीब तीन सम्मेलनों में पक्के तौर पर जाता हूं लेकिन उन छुटिटयों को साप्ताहिक अवकाश में भी सेवा देकर कटवा देता हूं। खैर, संपादक जी पिघल गए और दे दिया अभयदान। अगले दिन हरिवंश को सुनने पहुंचा तो आफिस के कुछ और साथी भी वहां पहुंच गए। रंगेहाथ धराया। परीक्षा का बहाना बनाकर ज्ञान बटोरने आया था! गनीमत था कि संपादक जी वहां नहीं पहुंचे थे। हरिवंश को सुनकर घर आने की बजाय दिल्ली प्रेस क्लब चला गया। वहां भी एक चर्चा होनी थी। कहते हैं किस्मत बार बार साथ नहीं देती। प्रेस क्लब में महिला साथी के साथ बहस करने के दौरान अचानक संपादक जी पर नजर पड़ गई। कुसंयोग इसे ही कहते हैं। अच्छा यह हुआ कि पहले मेरी नजर उनपर पहले पड़ी सो मैं कोने में दुबक गया। प्रेस क्लब से लौटते वक्त मेट्रो में कई तरह की शंकाओं ने घेर किया। कहीं संपादक जी ने प्रेस क्लब में छिपते देख लिया हो तो, कहीं आफिस के सहकर्मी ने संपादक जी को बता दिया कि मैं परीक्षा का बहाना करके हरिवंश को सुनने आया तो, कहीं नौकरी गई तो! खैर एक बात इन सब शंकाओं के बावजूद तसल्ली दे रही थी वह थी कि मैंने हरिवंश को सुन लिया था। आदत जाती नहीं।

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