Tuesday, May 15, 2012

कार्टून विवाद


                                                प्रतीकात्मकता की इकलौती राह पर दलित राजनीति

         प्रतीकवाद की राजनीति का जो संदिग्ध चेहरा पिछले दिनों लोकसभा में दिखा उससे देश में अभिव्यक्ति के पक्षधरों के बीच भय का माहौल बनना स्वाभाविक है। हालांकि भारत जैसे संघीय ढांचे वाले देश में अलग अलग पाठ्यक्रमों को लेकर विविध प्रकार की बहसें और गतिरोध सामने आ चुके हैं। मसलन भाजपा शासित राज्यों में गीता के अंशों को पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात हो या बिहार में योग को पाठ्यक्रम में शामिल करने पर हुई बहस हो या फिर यौन शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करने के बाबत हुई बहस, लेकिन पाठ्यक्रम में शामिल किसी कार्टून पर बहस का यह संभवतरू यह अकेला मामला सामने आया है। हालांकि मामला कार्टून को शामिल करने का न होकर कार्टून की गुणवत्ता का है, लेकिन जिस तरह से सरकार ने हाथ खड़ा कर आत्मसमर्पण किया है, उससे यह साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में पाठ्यक्रमों में कार्टूनों को शामिल नहीं किया जायेगा। 
      कार्टून के विवादित पहलुओं और कथित तौर पर भावनाओं के साथ हुए खिलवाड़ के बाद बहस अब प्रतीकात्मकता की ओर बढ़ रही है। प्रतीकात्मकता ही वो ताकत है जिसका उपयोग गांधी ने धोती पहन कर दलितों को एकजुट करने के लिए दांडी यात्रा के बहाने किया था और उसी प्रतीकात्मकता की ताकत को दलितों को उनकी जगह बताने के लिए आंबेडकर ने कोर्ट पहन कर किया था। लेकिन यह मानी हुई बात हो चुकी है कि प्रतीकात्मकता की ताकत भी बदलती परिस्थितियों के साथ बदली। आजादी के बाद साठ दशकों के दौरान हुए कई आंदोलन जिसमें पश्चिम बंगाल का मुक्ति दशक, जेपी आंदोलन, बिहार में मंडल आंदोलन, उत्तर प्रदेश में राम मंदिर आंदोलन के अलावे राज्यों के बंटवारे को लेकर हुए कई आंदोलनों ने देश की परिस्थियों और समीकरणों में व्यापक परिवर्तन किए। उदारीकरण के बाद परिस्थियां निर्णायक रूप से बदलीं और भारतीय समाज का हर पहलू बदला। मुद्दे बदले, नेतृत्व की मांग बदली और इन रास्तों से होते हुए राजनीति भी बदली। गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं सहित कई बुनियादी मुद्दे हाशिये की ओर बढ़ते गए लेकिन एक मुद्दा जो प्रासंगिक बना रहा वह था, प्रतीकात्मकता का मुद्दा। 
Courtesy: The Hindu
        मंडल आंदोलन से उपजे कई नेताओं को प्रतीक बनाया गया। जिस तरह लालू प्रसाद यादव, नीतिश कुमार, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव सरीखे नेता मंडल आंदोलन के समय दलित पिछड़ों के प्रतीक बनते बनते माननीय हो गए, उसी तरह मायावती जैसी नेत्रियों ने खुद को प्रतीक के रूप में स्थापित करके लंबी दूरी तय कर ली। लेकिन विचारशून्यता और अवसरवादिता के आगे धीरे-धीरे ये नेता अप्रासंगिक होते चले गए। मसलन गरीबों, जिनमें से अधिकतर दलित और पिछड़े वर्ग के हैं, के हित के लिए शुरू हुई योजना राष्टकृीय ग्रामीण जागरूकता मिशन को पलीता लगाने का काम मायावती ने कर दिया। आमतौर पर सरकारी सेवाएं ही गरीबों का उद्धार करती हैं, लेकिन बिहार में लालू राज में सरकारी सेवाओं का जिस तरह से दोहन किया गया, उससे सबसे ज्यादा नुकसान गरीबों का ही हुआ। वहीं दूसरी ओर देखें तो दलितों का प्रतीक बन चुकी मायावती ने भी अंबेडकर के नाम पर स्मारक खड़ा कर प्रतीकात्मक राजनीति को प्रासंगिक बनाए रखा। तमिलनाडु के वीसीके पार्टी के दलित सांसद तिरूमावलवन थोल ने योजनाबद्ध तरीके से मायावती का ही रास्ता अपनाया है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि लोकतंत्र की रीढ़ पर चोट करते हुए उन्होंने वही किया, जो उन्हें दिख पड़ा। क्योंकि दलितों के उत्थान को लेकर फिलहाल प्रतीकात्मक राजनीति से इतर कोई रास्ता अपनाने को कोई दलित नेता तैयार नहीं है। ऐसी स्थिति में प्रतीकात्मक राजनीति का अपनी चरम अवस्था में पहुंचना कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए।

                                                                                                                   लिंक

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