Tuesday, May 8, 2012

सिसकी


रणेन्द्र की यह कविता अपने समय के लिए एक चुनौती भी है और इसका खारिजनामा भी. यह चुनौती है कि बदलाव के गीत बदलाव के सुरों में ही गाए जाएं, भले ही उनके लिए आवाज को बेसुरा ही करना पड़े. यह खारिजनामा है ताकत और नाइंसाफी को सहनीय बनाती उस चमक-दमक का, जिसने हमारे अपने चेहरों पर पुती राख और खून को छुपा रखा है. आइए, चांद के बरअक्स चांदमारी की इस कविता में शामिल हों, क्योंकि हम स्वीकार करें या न करें, यह हमारे पड़ोस में, हमारे आस-पास हर जगह चल रही है. 

ख्वाबों को कँपकपाती है ...

भूलना चाहता हूँ
घर-दुआर का रास्ता
गाँव-टोला
दोन-टाँड़ खेत
फूलझर नदी
इजुवन-विजुवन के महुआ-साखू गाछ
अखड़ा-माँदर, सरहुल-करमा


भूलना चाहता हूँ
भर रात डेगाने वाला झूमर नाच
कि जागने से लाभ क्या
आदमखोर तो फिर भी खींच ले जाते हैं
ख्वाबों को कँपकपाती है वर्दी की छाया


भूलना चाहता हूँ
काले दिन और अँधेरी रातें
खुजलाहे कुत्ते-सा अपना वजूद
कि इस राह से जो भी गुजरता है 
लतियाता जाता है 


कुछ भी याद नहीं रखना चाहता 
न सोनी सोरी को 
न उसके नाजुक अंगों में पैवस्त
पत्थर के अश्लील टुकड़ों को 
सच तो बस यह है कि 
हाकिम-हुक्कामों की, कर्नल-कप्तानों की 
वीरता और सम्मान की कहानियाँ ही
इतिहास के पन्नों में दर्ज होंगीं 


वैसे भी 
जब देश इतनी तेजी से तरक्की कर रहा हो
तो ऐसी-वैसी बातें अच्छी नहीं लगती 
कविता में चाँदमारी नहीं
चाँद-चाँदनी की बातें ही शोभती हैं 
शोभती हैं शफक, धनुक, हिज्र, विसाल की बातें
मीना बाजारों ने ये कैसी रंगत बिखेरी
कि बदलाव के गीत गाने वाले 
अब अम्नो-शान्ति की ग़जल गुनगुना रहे हैं 


आस्माँ में चमक रहा है 
निजाम का दमदम दमकता ताज
मरमरी फर्श पर सुनहरी जूतियाँ
ग्लोब से गोलियाये जिस्म पर,
शफ्फाफ-पारदर्शी लिबास, 
और बच्चे ‘नंगा’ कहना भूल गए है


पर हम नहीं भूलना चाहते 
कि हमारी जिस्मों-जाँ पर पड़ी 
नीली-काली धारियों से बुनी 
चादर से ही 
धुलते-पुंछते रहे हैं
बादशाहों के पाँव.

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