Monday, April 9, 2012


एक साल बाद...

यह टिपण्णी समय से संवाद है, संभव है इसमें प्रवाह नहीं हो, इण्डिया गेट पर बरखा दत्त का आम लोगों द्वारा किये गये जोरदार विरोध को याद रखने के लिए एक संस्मरण के तौर पर इसे लिखा हूं. इसलिए इसके आधार पर किसी निष्कर्ष पर न पहुंचें
      उम्मीद की सारी किरणों को समेट कर ही उस दिन का सूरज डूबा था मेरे लिए। अन्ना की आंधी, काॅलेज में कैम्पस प्लेसमेंट और घर से बाबूजी के बीमार होने की खबर स्क्रोल की तरह हर घंटे दो घंटे में नजर के सामने से गुजरती थी। जो भी कर रहा था बेमन से कर रहा था। पूरे एक साल तक बेमन से पत्रकारिता की पढाई करने के बाद अगर कुछ मनलायक किया तो वह उस शाम को ही किया। एक सच यह भी है कि यदि उस दिन की शाम ऐसी नहीं होती तो मेरी जिंदगी मुड़ कर उस रास्ते पर नहीं जाती जिस रास्ते पर भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू, एस वाई कुरैशी, आर के आनन्द सरीखे लोगों को नजदीक से जानने का मौका मिलता है।
     मीडिया का समाज स्तरों वाला समाज है। अनुभव के आधार पर लोगों का स्तर बनता जाता है। उदाहरण के लिए आईआईएमसी आने से तीन साल पहले जब मैंने बेगूसराय के सिटी न्यूज में पत्रकारिता शुरू की थी तो पत्रकारिता मेरा जुनून था, आईआईएमसी के इंटरव्यू रूम में आने के बाद पत्रकारिता मेरे लिए करियर बना, आईआईएमसी में पढने के दौरान पत्रकारिता एक पाठ्यक्रम बना और नीरा राडिया प्रकरण के बाद पत्रकारिता मेरे लिये दलाली का दूसरा मतलब बन गया। यानि जिस जुनून, जोश और उत्साह में अपन ने एसएससी, रेलवे, बैंकिंग टाइप की जेनरल कम्पीटिशन को छोड़ा, वो जुनून अब मुझे दलाली के रास्ते पर ले जाने लगा। मैं अभी जहां काम कर रहा हूं वहां इतना सुकून है कि मैं दलाली नहीं कर रहा और मुझे काम करने की पूरी आजादी मिली हुई है। इसे बरखा प्रोटेस्ट के बदले मिला हुआ ईनाम समझ कर मैं हमेशा गर्व करता हूं। इसका एक कारण यह भी है कि अलग अलग संस्थानों में काम कर रहे सहपाठियों से अक्सर यह सुनने का मिलता है कि उसकी ये खबर काट ली तो वो खबर गायब कर दिया। मुझे अब तक ऐसा अनुभव नहीं मिला और यही कारण है कि कम सेलरी और अटपटे समय के बावजूद मैं यहां जुड़ा हूं। ट्वीटर पर एक बार जब मुझसे किसी ने मेरे बाॅस के बारे में पूछा तो मैंने सच बता दिया। उसके बाद कई लोगों ने कहा कि योगेश तुम ऐसी बहू हो जो अपनी सास की प्रशंसा कर रही हो! 
      पत्रकारिता के स्तर को समझने के लिए मैने जितना समय झोंक दिया वो बजट से ज्यादा हो गया और कई जगहों पर समय का टोंटा पड़ गया। समय ऐसा अनबाइलेंस हुआ है कि इधर का उधर और उधर का इधर करते करते पसीने से लथपथ हो चुका हूं फिर भी कई कोटे का समय पूरा नहीं हो पा रहा है। बाइचांस जिस लड़की से मिला और उसे जीवनसाथी बनाने का फैसला लिया उसके परिवार वाले ने छह महीने में एस्टेब्लिश होने का समय दिया। समय की सारी चुनौतियों में से यह चुनौती सबसे बड़ी रही। ऐसी जिसने छठ जैसे पर्व पर भी मुझे बेगूसराय से दूर दिल्ली में रोजगार के लिए खाक छानने पर मजबूर किया। इस एक साल में समय से प्रतिस्पर्धा करना सबसे बड़ी चुनौती रही और अब भी है। नवंबर में उसकी शादी तय हो चुकी है।
       मीडिया काफी हद तक न्यायपालिका जैसा हो गया है। किसी पत्रिका ने एक बार खुलासा किया था कि न्यायपालिका में जितने भी जज उंचे ओहदे पर पहुंचे हैं उनमें से ज्यादातर पहुंच वाले हैं। मीडिया एक हद तक ऐसा हो चुका है। इस एक साल में अलग अलग मीडिया संस्थानों में काम कर रहे कई सहपाठियों से मिले अनुभव के आधार पर मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं। आप खैनी खाते हुए बासगिरी कर सकते हैं अगर आप सवर्ण, माफ कीजियेगा, उंची जाति के सवर्ण हैं और पहुंच वाले हैं। लड़कियों को बेकार बदनाम किया जाता है कि वो आगे बढने के लिए अपनी अदा का सहारा लेती हैं। दरअसल मीडिया की संरचना ही ऐसी हो चली है कि इसमें बने रहने के लिए ये सब करना पड़ता है। एक सच यह भी है कि ऐसी लड़कियां लड़कों के लिए जितना चुनौती खड़ी करती है उतनी ही दूसरी लड़कियों के लिए भी। ये भी एक अनुभव है।
खैर, इस एक साल में जो अनुभव यादगार रहेगा वह मुंबई के एक अंग्रेजी अखवार में काॅलम लिखना है। सुना था कि एक बार शादी हो जाये तो लोग अपने आप जवाबदेह होने लगते हैं। मेरे साथ थोड़ा अलग हुआ। पैसे की तंगी के कारण मैं शादी से पहले ही वो सब अपने आप करने लगा जिसकी उम्मीद शादी के बाद की जाती है।  मसलन अंग्रेजी अखवार में काॅलम लिखकर अपना मोबाइल का खर्चा निकालने के आइडिये को आप क्या कहेंगे?
       अंत में, अगर वर्तमान परिस्थितियों से जूझते हुए भी मैं सही सलामत हूं तो बस और बस उन 777 फालोअर के कारण जो ट्वीटर पर मुझसे जुड़े हैं। ट्वीटर न होता तो मैं न होता। ट्वीटर सिखाने और जॉब दिलाने के लिए रघुनाथ सर को धन्यवाद।

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