Saturday, April 7, 2012

आईने के सामने...

                                                छवि का संकट 

        स्वाती को पहली बार जब देखा तो उसे लेकर मन में वही छवि बनी जो सनी लियोन को लेकर बनी थी। कम कपड़ों और इतना लिपा पुता चेहरा देख कर उसके बारे में कई ख्याल बुन डाले थे। मीडिया या निजी कंपनी में जाॅब करते हुए लड़कों के सामने सबसे बड़ी चनौती इन लड़कियों से मिल रही टक्कर से अपना बचाव करने की होती है। अक्सर कहते सुना है कि लड़कियां जाॅब में आगे बढने के लिये अपने जिस्म और अदाओं का खूब सहारा लेती है।  मीडिया में तो ऐसी लड़कियों ने अच्छे खासे प्रतिभाशाली लड़कों को अवसादग्रस्त तक कर डाला है। बरखा दत्त ने जब से मेरे पीछे रूबी ढींगरा को छोड़ा था तब से इस अवधारणा को और बल मिला है।

      पिछले दिनों अचानक जीमेल पर देखा कि स्वाती आॅन लाइन थी। उसे मैंने चेट में पहले अपने ब्लाग के उस पोस्ट का लिंक भेजा जिसमें काॅलेज के कुछ छात्रों की ग्रुप फोटो थी। उस फोटो में वो और मैं भी था। इसके बाद चैट शुरू हो गई। उसके खुलने का इंतजार करते हुए मैं धीरे धीरे फल्र्ट कर रहा था। इसी क्रम में मैंने उससे पूछ लिया कि उसकी पसंदीदा हीरोइन कौन है चूंकि वो अभी पूरी तरह खुली नहीं थी इसलिये मैंने उसके पूछे बिना ही कह दिया कि मुझे कैटरीना कैफ पसंद है। उसने रिप्लाय दिया कि उसे कैटरीना सबसे बेकार हिरोइन लगती है क्योंकि उसके पास सेंस नहीं है। मेरा बहकना जारी था। ‘चेहरे के अलावे एक लड़की को आगे बढने के लिए जो होना चाहिए वो सब उसके पास है‘ मेरा रिप्लाय था। काफी बेहूदी बात कही थी मैंने इस उम्मीद में कि वह अब खुल जायेगी और फिर मैं अपनी इस धारणा को पुष्ट कर लूंगा कि उस जैसे लड़कियां प्रक्रति द्वारा मिली उपलब्धि को अपनी उपलब्धि मानकर उसे भुनाते हुए कई प्रतिभावान लड़कों को कुचलते हुए आगे निकल जाती है। ‘‘उस जैसी लड़कियों के कारण लोगों को हमारी काबिलियत पर शक होता है और मेहनती लड़कियों को भी गलत नजरों से देखा जाता है‘‘ उसके यह अप्रत्याशित जवाब मेरे मुंह पर तमाचे की तरह पड़ा। मैं उसके साथ जो गलती कर चुका था उसे सही साबित करना कठिन होता देख मैंने लिख मारा कि मुझसे भूल हो गई लेकिन मैं लड़कियों के बारे में ऐसा नहीं सोचता। मैंने साफगोई से यह भी कह दिया कि उसके बारे में बनी गलत छवि ने मुझे ऐसी गिरी हुई बातें करने पर बाध्य किया। 
उसने मुझे माफ कर दिया और चेट को दूसरी दिशा देकर मैंने आखिरकार उसे मिलने के लिए काॅलेज बुला लिया। अप्रत्याशित रूप् से वह मान भी गई। उसके बारे में बनी हर छवि लगातार टूटती जा रही थी। अगले दिन काॅलेज की लाइब्र्रेरी में उससे मुलाकात हुई। उसके कपड़े फिर से उसी टाइप के थे। नजरें फिसलने से रोकते हुए मैंने उसकी आंखों में थोड़ी देर तक देखा। कहते हैं लड़कियों के अंदर छठी इंद्रियां होती है। लड़के को अपनी ओर देखता हुआ देखकर या एक स्पर्श मात्र से लड़की समझ जाती है कि लड़के के अन्दर क्या चल रहा है। बिहारी लड़के आम तौर पर मेरी तरह संकोची होते हैं और दिल्ली की लड़की इसे समझती है। इसे सच साबित करते हुए स्वाती अचानक उठी और लाइब्रेरियन की ओर भागी। मुझे आश्चर्य इस बात का भी था कि उसके इतने पास बैठने के बाद भी मुझे परफयूज की खुश्बू अब तक नहीं आई थी। उसके बारे में मन में बनी छवि पल पल टूटती और बनती जा रही थी। लौटी तो उसके हाथ में दो दिन पहले का जनसत्ता था जिसमें उसका लेख छपा था। ‘तो तुम जनसत्ता से जुड़ी हो!‘ मैंने आंख में आंख डालते हुए सवाल किया। उसने चुलबुले अंदाज में कहा  िकवह फ्री लेंस करती है और नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण सहित कई अखवारों के लिए लिखती है। वो बोलती जा रही थी और मैं बस उसकी आंखों में देखता जा रहा था। मेरे सामने इक्कीसवीं सदी की आधुनिक लिवाज में एक इमानदार, आत्मविश्वास से लबरेज और जुनूनी लड़की थी जिसके बारे में मैंने किताबों में पढा था और इस्लामी महिलाओं की दुर्दशा पर बनी फिल्मों  में देखा था। उसके बारे में जितना जहर था एक एक कर मरता जा रहा था और मेरी स्थिति असहजता की चरम अवस्था पर थी।
हद तो तब हो गई जब उसने साथ लंच करने का मेरा आग्रह बिना किसी मान मनौव्वल के स्वीकार कर लिया। उस वक्त तो मैं एक पल के लिए चौंक ही गया जब उसने लंच के लिए आटो के बजाय पैदल ही चलने की बात कही। कमाल है मैने आईआईएमसी में डेढ साल गुजारे, तरह तरह की माडर्न लड़कियों के तरह तरह के नखरे देखे। ठन्डे में कोल्ड ड्रिंक चवाते देखा और दो हाथों में तीन ब्लेकबेरी तक देखा.आटो से कालेज आने वाली कुछ लड़कियां कालेज के बाहर रुकने की बजाय आटो को कैंपस के अंदर तक ले के आती है। एक छवि फिर टूटी कि स्वाती नखरेवाली लड़की है। रेस्टोरेंट पहुंचने में करीब दस मिनट लगे। इस बीच चलते चलते करियर को संवारने की जितनी बात हुई उससे यह पता चला  िकवह सिविल सेवा की तैयारी में भी जुटी हुई है।
         मीनू उसकी तरफ बढ़ाते हुए मैंने ऑर्डर करने के लिए कहा. मीनू देखते हुए उसने कहा की उसके पास पराठे हैं. मैंने भी बिना देर किये बोल दिया कि मेरे पास भी रोटियां हैं. कमरे से चला था तो कुछ रोटियां बना कर थैले में डाल लिया. दो प्लेट चाउमीन और एक प्लेट मंचूरियन ऑर्डर करने के बाद बातों का दौर फिर से शुरू हुआ. इसी क्रम में पिछले बेच के एक लड़के का जिक्र भी हुआ. एक एक कर हर छात्र का जिक्र हो रहा था लेकिन इस समीर के जिक्र के बाद स्वाती ने मुझे रोक दिया. समीर वो लड़का था जो एक सरकारी अफसर बन चुका था. स्वाती ने उसके बारे में जितना बताया उसके बाद समीर से नफरत सी होने लगी थी. समीर किसी लडकी को धोखा दे सकता है ऐसा मैंने कभी नहीं सोचा था. अब मुझे धीरे धीरे कई और बातें भी याद आने लगी थी. खैर उसका चेहरा मुरझाता देख कर मैंने विषय बदला और उससे जॉब के बारे में पूछताछ करने लगा. जॉब के बारे में मैं निश्चिन्त था कि उसकी अदा को देखकर उसे कहीं न कहीं जॉब मिल ही गई होगी. लेकिन मुझे ताबड़तोड़ अगला झटका तब लगा जब पता चला कि बोस को 'इम्प्रेस' करके एक लडकी ने इसे रास्ते से हटा दिया. इसने आत्म सम्मान से samjhaut नहीं किया और नौकरी को लात मार दिया.  
      दो सौ का बिल था. मैंने पर्स से सौ के दो नोट निकाले और बढ़ा दिया. स्वाति ने भी साथ में एक सौ का नोट बढ़ा दिया. मेरे लाख मना करने पर भी वो नहीं मानी. आखिरकार दो सौ के बिल में हम दोनों एक एक सौ देकर निकले. मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं आईने के सामने हूं जिसमे मेरे प्रदूषित विचार और लड़कियों के बारे में धारणा साफ़ साफ़ दिखाई दे रही है. स्वाती जो दिख रही थी वैसी रत्ती भर भी नहीं थी.



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