Sunday, March 18, 2012

धर्म


                              भारत पाक मैच के निहितार्थ

         काफी दिनों बाद क्रिकेट मैच देखना हुआ। कम से कम चार साल बाद भारत पाकिस्तान का कोई वन डे ऐसे देखा होगा। विराट कोहली के शाट्स देखकर चार साल पहले के सचिन और गांगुली की जोड़ी की याद आ गई। तब मैच में राबिन सिंह, अजित आगरकर, जवागल श्रीनाथ वगैरह होते थे। घर में ओनिडा का ब्लैक एंड व्हाइट टीवी। मैच के दिन मां भी खुश रहती थी क्यूंकि टीवी से चिपके हुये कितनी रोटियां खा लेते इसका पता ही नहीं चलता था। 
        आज के मैच में ट्वीटर, फेसबुक वगैरह आने के बाद मैच को लेकर कुछ प्रत्यक्ष तजुर्बे ने झकझोर दिया। मैं जिस टोले में रहता हूं वहां स्वाघोषित देशभक्तों की बड़ी जमात है। वहां भारत पाकिस्तान के मैच पर सट्टा लगता है, भारत की हार की संभावनाओं के बारे में एक शब्द भी बोलना आपको फतवा जारी करने वाले समाज का हिस्सा बना सकता है। सामाजिक और शैक्षनिक माहौल में पिछले कुछ सालों में आये बड़े बदलावों के कारण अब क्रिकेट मैच में मेरी कोई खास दिलचस्पी नहीं रह गई थी फिर भी कल का मैच देखने को मन अचानक मचल उठा। 
 भारत के पिछले परफोरमेंस और शुरूआती रन गति के आधार पर मुझे लग रहा था कि भारत यह मैच गंवा देगा। ये बात मैने टोले के एक साथी से कही तो उसका मुंह कसैला हो गया। मैं सारी बोलकर वापस ट्वीटर पर जुट गया। ‘‘Kashmiri Pandit Virat Kohli is taking his revenge from Pakistan‘‘ट्वीटर की टाइमलाइन पर यह पोस्ट देखते ही दिमाग चकरा गया। पोस्ट जिसने की थी वह नाम से हिन्दू और चेहरे से मौलाना था। ट्वीटर के साल भर के तजुर्बे के आधार पर मुझे कई वैसे लोग मिले हैं जो मुस्लिमों के नाम पर झूठा अकाउंट बनाकर फतवा जारी करते हैं। यह अकाउंट भी वैसा ही था शायद। 
       इसी बीच भारत शानदार तरीके से मैच जीत गया। मन बेचैन था और खुश भी। खुश इसलिये कि भारत का शानदार प्रदर्शन रहा और फाइनली हम जीत गये और बेचैन इसलिये कि ट्वीटर पर उस स्टेटस के बाद दोनों धर्मों के ठेकेदार भिड़ गये. फाइनली मैने अपना सिस्टम शट डाउन कर दिया। अभी टोले से निकल ही रहा था कि प्रधान की दहाड़ सुनाई थी ‘‘कहां गये फतवा जारी करने वाले, भारत जीता तो फतवा घुस गया -- में‘‘! बेचैन मन और बेचैन हो उठा। मैने बस आकलन किया था कि भारत हार भी सकता है वह भी तब जब खेल आधा भी नहीं हुआ था। प्रधान भी होशियार था उसने सीधा मुझसे नहीं कहा इशारे इशारे में अपना दिल ठंढा कर लिया। चूकि देशभक्ति का उन्माद उस वक्त पूरे टोले में चरम पर था इसलिये मैं भी चुप रह गया।


        देशभक्ति क्या है इसका जवाब मैने कई बार खोजने की कोशिश की है लेकिन हर बार कोई न कोई पेंच परिभाषा को पूरा होने नहीं देता। क्या पूनम पांडे की भक्ति देशभक्ति है? क्या उसे मान्यता मिलनी चाहिये। अगर नही तो क्यूं नहीं और अगर हां तो किन शर्तों के साथ? पूनम पांडे मीडिया में बिकने वाली उन सामग्रियों में है जो हाथों हाथ बिकता है. मीडिया को खूब पता है की आज के दौर में क्या बिक सकता है और मीडिया उसे ही दिखाता है. मसलन ओसामा बिन लादेन के मरने के बाद मीडिया ने उन रैलियों को विशेष कर दिखाया जो ओसामा के समर्थन में कट्टरपंथियों ने निकाली थी. कुछ इस तरह की छवि बनी कि पूरा पाकिस्तान ओसामा का समर्थन कर रहा है और सभी मुस्लिम आतंकवादी हैं. इस खबर से जिसे जो मिलना था मिल गया. हंस में प्रकाशित एक लेख में प्रियदर्शन ने कहा है कि किस तरह ओसामा की हत्या की रिपोर्टिंग और उसके बाद की गतिविधियों को मीडिया ने एक विशेष तरीके से कवर किया. इसका विरोध करने पर इण्डिया टी वी की एक मुस्लिम स्टाफ को नौकरी से निकाल दिया गया. क्या ये मात्र संयोग है कि भारतीय न्यूज चैनलों पर होने वाले डिबेट में सिर्फ गरमपंथी मुस्लिमों को जगह दी जाती है. यानि आमतौर पर जिसकी दाढ़ी बड़ी हो और जिस पर फतवा जरी करने के आरोप लगे हों. वो मुसलमान कहाँ हैं जो इस तरह के फतवों का जोरदार विरोध करते हैं? मुस्लिमों का वो तबका सिर्फ बीबीसी पर ही क्यूँ दिखाई देता है?
        क्या कश्मीरी पंडितों की हालत का दोषी सिर्फ इस्लाम का वो धड़ा है जो ओसामा के समर्थन में पाकिस्तान में रैलियां करता है और जो पाकिस्तान सहित विश्व के अन्य भागों में हिन्दू लड़कियों को जबरन इस्लाम बनाता है? इसका जवाब वही है जो इस सवाल का है कि क्या सलमान रूश्दी को भारत न आने देने वाली जमात इतनी ताकतवर है कि स्वामी रामदेव के समर्थकों और अन्ना हजारे के समर्थकों को छल से निपटाने वाले राज्य के आगे अपनी मनमानी कर ले? कल का इतिहास अगर हमें यह बताये कि रूश्दी को  आने से इस्लाम धर्म से रोका और लोग इसे पढ कर इस्लाम के बारे में धारणा बनाये तो इसमें किसे दोष दिया जायेगा। धर्म के नाम पर मुट्ठी भर पगलाये लोगों के साथ अगर पूरे राज्य का नेत्रत्व मिल जाये तो उसकी ताकत जरूर इतनी हो जायेगी कि वह भारत के संसद पर हमला करे और मुंबई के निर्दोष हिन्दू मुस्लिमों की नृशंस हत्या करे। प्रमोद मुतालिक और नरेन्द्र मोदी जैसे लोगों के पीछे जिस तरह मीडिया पड़ती है उससे मीडिया के बारे में भी वही छवि और संदेह उत्पन्न होता है जो राज्य के चरित्र के बारे में देश के जागरूक तबके के बीच उत्पन्न हो रहा है। 
 इस्लाम के इतिहास में जाने पर यह समझ आता है कि किस तरह तत्कालीन जातिओं का इस्लाम में विलय होता गया. चाहे मध्य एशिया की बर्बर हून जाति(मुहम्मद गजनवी) हो या फिर अपनी वीरता के लिए जाना जाने वाले मंगोल जाति(बाबर) या फिर बौद्ध(चंगेज खां), इस्लाम का प्रसार तलवार के दम पर होता चला गया. लेकिन इतिहास हमें यह भी बताता कि टीपू सुल्तान के समय तीन हजार ब्राह्मणों ने इस्लाम न कबूर कर पाने के कारन आत्महत्या कर ली थी. यह कतई नहीं माना जा सकता कि धर्म परिवर्तन की वजह सिर्फ हिंसा का डर रहा होगा. संभव है कि कई ऐसे ऐतिहासिक कारण होंगे जिसने गैर इस्लामों को भी इस्लाम स्वीकारने पर बाध्य किया होगा. मसलन तमिलनाडु में अस्सी के दशक में जिन लोगों ने इस्लाम काबुल दिया उसके पीछे हिंसा को कारण नहीं बताया जा सकता. इसे समझने के लिए अच्छा होगा कि समाज के साम्प्रदायिक चरित्र को न देखकर जातिवादी चरित्र को देखा जाए. जाति आधारित आरक्षण का गणित जिस सूत्र से हल होता है उस सूत्र की खोज जिस ऐतिहासिक कारणों के बीच हुई उसे समझने की जवाबदेही आज के युवा पीढ़ी की है जो मार्गदर्शन के अभाव और मीडिया के प्रकोप के कारण भटक चुका है. 
        इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रह चुके बी एन पांडे ने 1977 में राज्यसभा में दिये गये अपने भाषण में बताया था कि किस तरह ऐतिहासिक दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ की गई है। ये काम अंग्रेजों ने इसलिये किया था ताकि हिन्दू और मुस्लिमों को एक दूसरे के खिलाफ भरकाया जा सके। प्रमाणित दस्तावेजों से तो यहां तक स्पष्ट हुआ है कि अंग्रेज अफसरों में हिन्दू और मुस्लिम के कई पंडितों और मौलानाओं के अलावे कुछ शीर्ष नेताओं को बकायदा इसके लिये खूब पैसे और जमीन दिये कि वो वैमनस्य फैलाने वाले भाषण दें। आजाद भारत की सत्ता का चरित्र इससे अलग कहां है! सुकून है तो बस इस बात का कि कई लोग अब इसे समझ रहे हैं वरना सलमान रूश्दी और ओसामाजी पर राजनीति करने वाली पार्टी का उत्तर प्रदेश में इस तरह सूपड़ा साफ नहीं होता। 
       इस बीच खबर ये है कि प्रगतिशील, उदार व आधुनिक शिक्षा के हिमायती व दारुल उलूम देवबंद के पूर्व मोहतमिम मौलाना गुलाम मोहम्मद वास्तान्वी ने एक बार इस बात पर जोर दिया है कि मुसलमानों के लिए दीनी तालीम के साथ साथ आधुनिक शिक्षा लेना भी बहुत जरुरी है. महाराष्ट्र के अक्कलकुवां में देश के सबसे बड़े दीनी मदरसे व आधुनिक शिक्षा इंजीनियरिंग, एमबीए, मेडिकल कोलेज जैसे संस्थानों की लम्बी कड़ी के संचालक मौलाना वास्तान्वी ने केंद्र सरकार से अपील की है कि वह केन्द्रीय मदरसा बोर्ड बनाने की योजना को रद्द कर दे और मुस्लिम बहुल इलाकों में आधुनिक शिक्षण संस्थाओं को स्थापित करने पर ख़ास ध्यान दे. जिससे मुस्लिम समाज के प्रतिभाशाली युवकों को डॉक्टर, इंजीनियर, उच्च पुलिस व प्रशासनिक सेवाओं में जाने का मौका हासिल हो.
         बेशक, मुस्लिम शिक्षण व्यवस्था एक बड़ा सवाल है. एन चंद्रा द्वारा निर्देशित फिल्म "ये मेरा इंडिया" में भारत की सच्चाई को काफी हद तक रेखांकित किया गया है. यह फिल्म काफी हद तक भारत की सच्चाई बयां करती है. फिल्म यह स्पष्ट संदेह देती है कि जिस तरह सिर्फ गीता या रामायण पढ़ कर आधुनिक समाज के साथ कोई कदमताल नहीं कर सकता उसी तरह कुरान या मुस्लिम धार्मिक ग्रन्थ के सहारे कोई मुस्लिम आधुनिक समाज के साथ नहीं चल सकता है. फिल्म का एक डायलोग है "इंडिया इस इम्प्रूविंग, वे हेव टू वेट". पिछले दिनों पकिस्तान में धर्म परिवर्तन को लेकर कड़ा विरोध जताने वाले लोग भी मुस्लिम ही हैं, महिलायों के खिलाफ फतवा जारी करने वाले मौलवियों के खिलाफ मोर्चा खोलने वाली महिलाएं भी मुस्लिम हैं. वीना मालिक को रोल मॉडल बनाने के पीछे जो महिलाएं हैं वो किसी दुसरे ग्रह की नहीं हैं. 
          रूस की बोल्शेविक क्रांति के समय स्टालिन ने कहा था कि सूर्योदय को कोई नहीं रोक सकता है, मुस्लिम समाज भी अपनी शिक्षण प्रणाली और रुढियों से उबार कर आज न कल आगे आ ही जायेगा अगर वास्तान्वी जैसे लोग इस धर्म को अपना मार्गदर्शन देते रहे. विश्व के सामने अभी सबसे बड़ी चुनौती मीडिया और अलग अलग देशों की राजनीति का चरित्र है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद जिस तरह अमेरिका ने इस्लाम के कट्टर धड़े का उपयोग किया वही उपयोग भारत की राजनितिक पार्टियां करती आई है. निश्चित तौर पर इस्लाम को मानने वालों के लिए इसे समझना और इस चुनौती का समाधान करना अपने आप में एक बड़ी चुनती है.
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