Saturday, March 17, 2012

बाज़ार


                                         शहर में ईलाज

     मां बीमार थी। बिहार के डोक्टरों पर भरोसा नहीं रहा अब. तय हुआ कि इलाज दिल्ली में होगा। दिल्ली में कहां? पूछताछ शुरू हुई, जो आमतौर पर देहातों में हुआ करती है। एम्स की छाप है सो वहीं इलाज कराने का मन बना। लेकिन एक पेंच था कि एम्स में ईलाज कराने के लिये कम से कम पंद्रह दिनों तक दिल्ली में टिके रहने का खर्च होना चाहिये। ये संभव नहीं था क्योंकि इससे घरवालों की रोजी रोटी पर बट्टा लग जाता। विकल्प की तलाश शुरू हुई और अंततः सर गंगाराम अस्पताल पर सुई जाकर रूक गई। गंगाराम वाले ज्यादा नहीं झुलाते हैं यानि पैसे की बचत।
      काउंटर पर कोई खास भीड़ नहीं दिखी। शायद रविवार होने के कारण छुट्टी थी। रिसेप्शनिस्ट ने डॉक्टर का नाम पूछा तो उसने सहमे हुए कह दिया डॉ एस सी भरेजा। रिसेप्शनिस्ट ने उसे चैंकाते हुये एक चिरकुट यानि कागज के टुकड़े में एक मोबाइल नम्बर देकर कहा कि इस नम्बर पर सुबह आठ से दस बजे के बीच फोन कर के अप्वाइंटमेंट ले लीजियेगा। वह थोड़ी देर वहीं खड़ा रहा। फिर असहजता से उसने अपने आगे खड़े एक व्यक्ति से कहा कि चिट्ठा कहां लगता है? उस आदमी ने रिशेप्शनिस्ट की तरफ ईशारा किया। वह झेंप गया।
     वहां से निकल कर वह लुढकने के अंदाज में चलते हुये वह हॉस्पिटल के सामने खड़े कुछ रिक्शेवालों से किसी धर्मशाला का पता पूछने लगा। रिक्शा यानि बिहार। बिहार यानि अपना। किसी रिक्शेवाले ने एक धर्मशाला का पता बता दिया। रिक्शावाला शायद ठीक आदमी था इसलिये उसने यह भी बता दिया कि धर्मशाला पास में ही है और आप टहलते हुए जा सकते हैं। दिल्ली में ऐसा कम ही होता है यहां का आलम यह है कि बेरसराय से जेएनयू के गंगा ढावा के लिये ऑटो से बात करें और उसे पता चल जाये कि आप नये हैं फिर तो वो आपको आईआईएमसी और ब्रह्मपुत्रा होस्टल का परिक्रमा कराने के बाद सौ रूप्या मांग बैठेगा। 
      धर्मशाला में कमरे तो खाली थे लेकिन कमरा उसी को मिलता जिसका कोई परिजन अस्पताल में भर्ती हो। उसने हिम्मत नहीं हारी और करीब एक घंटे तक प्रयास करता रहा कि उसके औकात का कोई कमरा करोलबाग में मिल जाये ताकि वह सर गंगाराम अस्पताल में अपनी मां का ईलाज करा सके। समय बिल्कुल नहीं था। मां को लेकर अन्य लोग ट्रेन पर चढ़ चुके थे। आखिरकार भारी मन से उसने एक होटल के दूसरे तल पर एक कमरा दो दिनों के लिये बुक कर लिया। तेरह सौ रूप्ये एक दिन के। 
      अप्वाइंटमेंट लेकर कल होकर वह देश के प्रतिष्ठित अस्पताल सर गंगाराम में पहुंचा। बारह का अप्वाइंटमेंट था और सवा बारह बज रहे थे। डॉक्टर के कमरे के बाहर बेंच पर तीन लोग ही थे। वह गेट के पास मां को लेकर खड़ा हो गया। थोड़ी देर में अंदर से दो आदमी निकले जिसके वे अन्दर चले गये.
      डॉक्टर ने घुसते ही छह सौ रूप्ये मांगे। वह चैंक गया। फिर थोड़ा सकपकाते हुये उसने पिछली जेब से हजार के नोट निकाले और डॉक्टर की ओर बढा दिया। डॉक्टर ने उपरी जेब से चार सौ निकाल कर उसे थमा दिये। पूछताछ के बाद डॉक्टर ने मरीज की थोड़ी चमड़ी काट कर जांच के लिये एक डब्बे में डाल कर उसे दे दिया। डब्बा थमाते हुये डॉक्टर ने 1800 रूप्ये मांगे। उसने बिना सवाल किये डॉक्टर की ओर हजार का दो नोट बढा दिया। इस बार फिर डॉक्टर  ने अपनी उपरी जेब से सौ का दो नोट उसे वापस कर दिया। 
     केबिन से बाहर आकर वह सिढी से नीचे उतरा और ग्राउंड फ्लोर पर आकर लैब में वो डिब्बी दे दिया। लैब प्रबंधक ने उसे तेइस सौ रूप्ये जमा करके परसों आने को कहा। उसने इस बार हिम्मत करके कहा कि इस जांच के लिये वह डॉक्टर को उनके केबिन में 1800 रूप्ये दे चुका है। लैब वाला ठंढे दिमाग का था शायद सो बिना झल्लाये उसने डॉक्टर की पर्ची उसे वापस लौटा दी। वो बेचारा पर्ची के साथ पैसे अटेच कर लैब वाले को वापस लौटा दिया और मां को लेकर वापस होटल में आ गया।
     दिल्ली की शाम आम तौर पर अशांत होती हैं। यहां शाम ढलने पर चिडि़यों की मधुर आवाज न सुनाई देकर गाडि़यों की डकार सुनाई देती है। वह चल रहा था लेकिन उसका थका दिमाग चलने को तैयार न था। सामने होटलों की लम्बी कतार देखकर उसकी आंखों में थोड़ी रौनक आई। एक एक कर उसने पूछना शुरू किया लेकिन पंद्रह सौ से कम का कोई नहीं था। आखिरकार करीब आधे घंटे तक मशक्कत करने के बाद उसे एक होटल में नौ सौ का कमरा मिल गया। यानि चार सौ की सीधी बचत। कल होकर रिक्शे से वह अपनी मां के साथ नये होटल में शिफ्ट हो गया। दो दिन कट गये। रिपोर्ट के हिसाब से डॉक्टर ने दवा दी और वो उसी शाम वापस अपने गांव लौट गया। रास्ते में उसे बार बार एक ही बात याद आ रही थी कि किस तरह गांव के एक शिक्षक उससे महीने की फी लिफाफे में लाने को कहते थे! वो चला गया.

                                                                                                                                      LINK


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