Friday, March 9, 2012

शाम


 शाम के बाद 

एक मलीन सा चादर लपेटे
एक बदहवाश सी खामोशी लिये
तुम आई थी इधर,
जहां बसता था एक डर
जहां रोती थी हर शाम कुहर के
जहां दीवालें सदमें में चुप थीं
और पड़ोस में होती थी कानाफुसी
तुम आई थी इधर, इस घर में,
लोग कहते थे, चुप थे, शांत थे
शोर फिर भी था, हर चौक पर,
तुम चुप थी, भूखी थी, शांत थी
शोर फिर भी था, हर मजलिस में
वो शोर अभी थमा नहीं कहीं भी
दूर आज भी सुगबूगाहट है
बेचैनी है, इंतजार है और गुस्सा भी
लेकिन तुम अब भी बेपरवाह हो
सोचता हूं एक गजल लिखूं तुम पर
एक नाम दूं तुम को
उस पहचान के लिये जो तुम हो
लेकिन चुप हूं इस इंतजार में
कि तूफां अभी थमा नहीं
दूर सुगबुगाहट आज भी है
कि खिड़की के बाहर कोई हाथ
और दीवाल के उस तरफ कोई आवाज आज भी है
तुम हो तो सांसें हैं, चलती हुई, मदिर मदिर
आवाजें हैं, लड़खड़ाती हुई, ठहर ठहर
अतीत है, बार बार, जार जार
कि आखिरी करवट अब भी बाकी है
जिसके बाद दूर एक खामोशी होगी
एक शून्य होगा और होगी एक अंतहीन शाम,
ठीक वैसी ही जैसी पहले थी
वैसी ही जैसी तब थी, जब तुम आई थी
शायद तब तुम खामोश न रहो
शायद तब मैं, मैं न रहूं और 
शायद तब जब हम, हम न रहें
और क्या पता तुम भी तुम न रहो



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